घर | उत्तम कुमार

घर नहीं पिता कि मन्नत है,
ये माँ कि बनाई हुई जन्नत है।

यहाँ खुशियाँ बेशुमार और,
आँसुओं कि किल्लत है,
घर नहीं पिता कि मन्नत है।

हर ओर फैली है सुख कि चादर,
यहाँ गमों कि क्या जरूरत है,
ये माँ कि बनाई हुई जन्नत है।

दर्द गायब है हर कोने से,
छत से टपकता मेहनत है,
दरवाजे से आती हँसी तो,
खिड़कियों से आता सुकून है,

ये छोटा सा चाहरदीवारी नहीं,
हमारी पूरी सल्तनत है,
घर नहीं पिता कि मन्नत है,
ये माँ कि बनाई हुई जन्नत है।

 

– उत्तम कुमार

Uttam Kumar
Uttam Kumar

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