Ganesh Ghaat - Ganesh Chaturthi Special

गणेश घात | विशाल स्वरुप ठाकुर | गणेश चतुर्थी स्पेशल

गंगा का वह गणेश घाट, दिमाग में टेंशन और जिंदगी की वह कसौटी जहाँ पर आदमी या तो कुछ कर गुज़र जाता है या गुज़र जाता है।

कुछ कर गुज़रना तो इस वक्त मुमकिन नहीं लेकिन गुज़र जाने जो एक आप्शन बचा है वह भी लाज़मी नहीं लग रहा। जेब में एक सिगरेट तो है मगर उसे जलाने के लिए माचिस नहीं और लाइटर रखने का शौक कभी पाला नहीं। एक आप्शन और था कि भगुआ धारण कर लूँ लेकिन कब तक।

कई सारे बाबा लोग यहाँ बैठे हैं किसी पे तो माचिस होनी चाहिए,अरे माचिस यहाँ तो सब भोले के भक्त हैं,मैं भी हूँ और इस दुनिया का अट्ठारह के बाद कोई ही ऐसा बचा हो जो बाबा की शरण में न गया और नहीं गया तो कहीं नहीं गया।

एक सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा ने मेरे माथे पर चिंता की लकीरों को भांपते हुए कहा – हे वत्स ! तुम्हारे जीवन में जो बाधा है वह तुम खुद हो। वह भी इसलिए की जो काम तुमने खुद कर लेने चाहिए थे उनको तुमने किसी और के भरोसे छोड़ रखा है।

आपको कैसे मालुम? मैंने पूछा।

ये मैं नहीं कह रहा, ये तो तुम्हारा हाल ब्यान कर रहा है। इतनी देर से यहाँ बैठकर सोचने में लगे हो, बार बार नदी में देखकर कूद जाने की सोच रहे हो, और सिगरेट को देखकर कुछ सोच रहे हो, शायद तुम्हारे पास माचिस नहीं है। अब यही देख लो तुम माचिस बिना सिगरेट लिए बैठे हो ये ही दिखाता है कि तुम इस भरोसे में हो कोई दे देगा। अगर न दे कोई।

बाबा की बाते थी तो सीधी सीधी लेकिन एक रहस्य को खोलने में समर्थ प्रतीत हो रही थी।

यह लो माचिस और बैेठो गंगा जी के किनारे थोड़ी देर और सोचो की कौन कौन से काम तुम दूसरों के भरोसे छोड़कर आये हो। कहाँ से आये हो यह मैं नहीं जानता लेकिन दूर के हो। और तुम्हे बहुत दूर तक जाना है।

मैं इन बातो को सुनकर नदी के किनारे बैठ गया और जला ली सिगरेट। यह उसी पैकेट से बची हुई सिगरेट थी जिसकी एक सिगरेट एक दिन पहले पियूष मिश्रा( दिल्ली में) जी को भेंट करके हरिद्वार आ गया था।

जैसे ही सिगरेट खतम हुई तो मेरे दिमाग में वह रहस्य खुल सा गया जो बाबा जी बताना चाहते थे, सिगरेट ख़तम हुई मैं उठा और उस जगह गया जहाँ हमारी बातचीत हो रही थी, बाबा अब वहां न थे, खटिया के पास भभूत पड़ी थी, वह भोले की थी या बाबा के आग सेकने से भुझी पतियों की नहीं जानता, मैंने वह भभूत हाथ में उठा ली और माथे की उन लकीरों पर रगड़ दी ताकि मेरी उलझने मुझ तक ही रहें।

और कुछ भभूत रख ली एक कागज़ में ताकि लगाता रहूँ उन्हें लकीरों पर जब भी उलझने मुझपर हावी होने लगे।

– विशाल स्वरुप ठाकुर

 

Vishal Swaroop Thakur
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