गड्तंत्र की ज़मीनी हक़ीक़त | दीप्ति पाठक | गड़तंत्र दिवस विशेष

आज 26 जनवरी ,गणतंत्र दिवस की भोर न जाने मेरे मस्तिष्क पटल पर कितनी भूली बिसरी यादों का सैलाब ले आयी हो।वो पास के ही किसी स्कूल से आते देशभक्ति के गानों की आवाज़ों से जिस्म में एक झुरझुरी सी छूट गयी, सब बचपन के पुराने पल याद आगये।

जब शायद मुझे गणतंत्र दिवस का मतलब तो सही से नही पता था, पर उत्साह कुछ ऐसा था कि बस देखते ही बनता था। उस समय गणतंत्र दिवस बस एक त्योहार सा हुआ करता था, जिसकी तैयारियां घर से ज़्यादा स्कूल में होती थी, उस दिन चेहरे की रौनक ही अलग होती थी, और खुशी और उत्साह देखते ही बनता था, फिर चाहे वो परेड में हिस्सा लेने का हो, हाथ में तिरंगे रिब्बन बांधने का, या कार्यक्रम के अंत मे मिलने वाली उस बूंदी का, और फिर वो भाषण प्रतियोगिता, गान प्रतियोगिता और ना जाने क्या क्या?

इतनी व्यस्तता रहती मानो देश की hi-authority हम ही हो जैसे और घर का माहौल भी एक दम अलबेला सा ही किये रखते थे खुद की तरह, मुझे याद है आज भी के इंडिपेंडेंस डे 15aug को आता है और उसे स्वतंत्रता दिवस कहते है और republic day 26th jan को और इसे गणतंत्रत दिवस कहते ये सीखने में ही 2-3 साल लगगए थे और बहुत डांट भी पड़ी थी इसके लिए, क्योंकि हमारे लिए तो 26th jan वही हुआ करता था वो जिसमें tv पर परेड आया करती थी, झांकिया दिखाई जाती है।

बहुत ही अंदर तक जोश और उत्साह देने वाला होता था वो, स्कूल से आते ही बैठ जाते थे tvके सामने, और जो कही वो खत्म हो जाये तो न्यूज़ पर बार बार उसे ही ढूंढा करते थे, फिर पापा बताया करते थे कि इस बार झांकी मैं क्या नया था, और क्या सबसे अच्छा था।

और 15th aug कुछ कम पसंद था, क्योंकि उस दिन tv पर परेड देखने को नही मिलती थी पर उत्साह में कोई कमी नही होती थी, बस यही समझ थी उस छोटे से दिमाग में, फिर वो दादी नानी के अपने टाइम के किस्से, जिसे सुनकर तो जोश मानो 7वे आसमान तक पहुच जाता था। वो भगतसिंह की कुर्बानी, वो गाँधी जी का अहिंसावाद। सब बस बार बार सुनते रहना अच्छा लगता था।

अब बड़े हुए है तो independence day और republic day में सब फर्क समझ आगया है। पर क्या सच में समझ आगया है।सोच कर सोचती हूं तो यही समझ आता है, वो बचपन ही सही था जब कुछ समझ नही आता था। वो सही था ना, के 15th aug को हमे अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिली और 26th jan को हमारा संविधान लागू हुआ।

पर अब जबसे इसके मायने समझ आये है, ऐसा लगता है मानो अभी भी किन्ही बेड़ियों में जकड़े से है। पर ये बात जब मैंने दादी से कही तो उन्होंने कहा ये सब फालतू की बातें हैं। हमारे टाइम में तो हम बाहर निकलते भी डरते थे, हम कहाँ ऐसे तुम्हारे जैसे आराम से स्कूल जा सकते थे। कहाँ इतनी आज़ादी होती थी तब।

अब तुम्हारा जहां मन करता है जाते हो,जो मन करता है कहते हो, पहनते हो। वैसे मन ही मन लगा भी के ये बात तो सही है। पर फिर वो मेरे पिछले साल की दोस्तों के साथ घूमने जाने का plan याद आगया। जो इसलिये cancelहो गया था, क्योंकि लड़कियों का ऐसे अकेले बाहर जाना safe नही होता है। और वो 8 साल की नन्ही सी जान याद आगयी जो बस पढ़ने के लिए ही तो school गयी थी… पर किसी के लिए उसकी ज़िन्दगी और इज़्ज़त से ज़्यादा ज़रूरी अपनी हवस थी।

और याद आया वो नोटों की बंदी में हालातों की तंगी में मेरे आगे खडे दादा का गश खा के गिर जाने और अगले दिन अखबार के वो शोक संदेश वाले पन्ने पर नज़र आना। याद आया मुझे, वो बात बेबात पर हर रोज़ दंगों, विद्रोह की खबर आना, कभी किसी के आरक्षण पर, और कभी किसी movie पर यूँ हिंसा फैलाना। ये बात किसी लड़की या किसी सरकार की नही है।

बात बस इतनी सी है कि आज कहीं ना कहीं हर कोई मन में एक डर लिए रखता है। आज हिंदू, मुस्लिम और मुस्लिम हिन्दू से डरता है। मुझे पता है भारत आज़ाद हो गया। संविधान के पन्नो में इसका अस्तित्व सुनहरा सा सुनहरी कलम से कुछ और पक्का हो गया। खुशी है मुझे इस बात की के आज हमे हमारे दादी नानी जैसा जीवन नही जीना पड़ता, पर कभी कभी सोचती हूं तो लगता है जैसे आज भी मुझे आज़ादी के मायने समझ नही आये है। या शायद आज भी भारत थोड़ा सा आज़ाद होने से रह गया।

माफ कीजियेगा अगर किसी की भी भावनाएं आहत हुई हो तो। ये बस एक कोशिश भर थी। बचपन की यादों के rollercoaster से आज की जमीनी हकीकत के सफर को तय करने की। और मेरे इस लेख से मुझे देशद्रोही ना समझ लीजिएगा। मुझे मेरे भारत देश से बहुत प्यार है, ये घर है मेरा पर घर में भी कोई चीज़ सही नही होती तो उसे सही करने की कोशिश की जाती है, धूल में नही सने रहने दिया जाता और वैसे भी खुद की किसी चीज़ की तारीफ खुद क्या करना मेरा वतन है मुझे तो इससे बेइंतेहन मोहब्बत होगी ही।

जय भारत,जय हिंदुस्तान, जय हिंद।

-दीप्ति पाठक 

 

Deepti Pathak
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