Ekkees Din | Mid Night Diary | Gopal Yadav

इक्कीस दिन – एक मधुर पीड़ा | गोपाल यादव

सर्दी कुछ ख़ास नहीं थी फिर भी कॉलेज में सेमेस्टर एग्जाम के बाद हुए इस विंटर वेकेशन का एक दिन मैं अरविंद के साथ बिताना चाहता था। अरविंद जो कि एक शांत किस्म का इंसान है। मेरी उससे मुलाकात दो साल पहले हुई थी जब वह अपनी कहानी- “वो इक्कीस दिन” को वास्तविकता में जी रहा था। मुझे उसके स्वभाव से विशेष रुचि हो गयी थी। चुनाँचे मैंने एक दिन निकालकर उससे मिलन सुनिश्चित किया।

मैं सुबह के सवा दस बजे के क़रीब उसके घर पर पहुँचा जो गुमनामपुर की अँधेरी बस्ती में पड़ता है। एक अकेले इंसान के लिए एक कमरा भी काफी होता है मगर उसके मकान में कुल नौ कमरे, चार रसोई, दो बरामदा, तीन गुसलखाने और एक स्नानघर थे। घर के सामने एक बड़ा सा आँगन था जिसमें कुछ बागवानी की हुई थी। इन सबके बावजूद अरविंद अकेला ही रहता था और उसका गुज़र बसर केवल और केवल एक ही कमरे में होता था।

बाहर का दरवाजा खुला था और दाखिल होते हुए मैंने अरविंद के कमरे की ओर कदम ताल किया। सामने जब अरविंद का कमरा महज पाँच फ़ीट की दूरी पर रह गया तो मैं रूक कर सोचने लगा कि कमरे की बत्ती बुझी हुई है, कहीं अभी अरविंद सो तो नहीं रह है। मैं कहीं बहुत सुबह तो नहीं आ गया। मैंने समय देखा तो घड़ी सवा दस का इशारा कर रही थी। आमतौर पर अरविंद आठ बजे तक जग जाया करता था।

आगे बढ़ते हुए मैंने जब दरवाजा खोला तो दरवाजे से चुर्र-चुर्र आवाज़ हुई। मैंने अंदर झाँका तो अरविंद अपने तख्ता वाले बिस्तर पर रजाई ओढ़कर बैठा था। अरविंद का तख्ता आम तख्ते से चौड़ा हुआ करता था।

कमरे में नीचे फर्श पर रात का जूठा बर्तन रखा था। कुछ दूरी पर एक चौदह इंच का टी- सीरीज का रंगीन टी. वी. रखा था जो हमेशा किसी न किसी समस्या से जूझता ही रहता था। तख्ते के बगल में ही झरोखा था जिसमें बारह- पंद्रह साल पुराना काँच जमाया गया था।

काँच ज्यादा पारदर्शी नहीं था जिससे हल्की हल्की छन कर आ रही धूप माहौल के बेतरतीबी को झलका रही थी। पास में ही अरविंद की पढ़ने की मेज और कुर्सी थी जिसपर वो गिने चुने दिन ही बैठकर पढ़ा था। अब उसपर महज कुछ किताबें और कपड़े ही रखे थे जिन पर बेतहाशा धूल जम चुकी थी। बगल की अलमारी किताबों से आधी भर चुकी थी।

अरविंद मुझे देखकर मुस्कुराते हुए बैठने के लिए कहता है। मैं पास ही रखी हुई कुर्सी को खींचकर तख्ते के पास ले आकर बैठ गया। अरविंद का चेहरा मुझे असमंजस में धकेल रहा था। आज दो वर्षों के अंतराल पर अरविंद के चेहरे पर कुछ मिले जुले भाव झलक रहे थे। मैंने अरविंद से मुखातिब होते हुए उसका हाल पूछा और कहा कि आज अभी तक सोये हुए हो…

अरविंद मुस्कुराकर रह जाता है। मैं समझ गया कि कुछ बात तो है जो इसके दिमाग मे चल रही है। मैंने बात को बिना घुमाये, बिना टाल मटोल करते हुए सीधा और सख़्त सवाल दाग बैठा, “मियाँ, तुम कुछ परेशान नजर आ रहे हो। क्या हुआ है, वास्तविक बात बताओ। छुपाने की नाकाम कोशिश मत करना क्योंकि तुम्हारे चेहरे से सब झलक रहा है।”

“अमा यार, कुछ नहीं है। तुम फिज़ूल में ही हवाई घोड़े उड़ा रहे हो।” अरविंद मुस्कुराते हुए कहता है।
“इस बार भी तुम्हारी मुस्कुराहट तुम्हारी परेशानी को छिपा नहीं पाई, अरविंद। अब बता भी दो। तुम ही तो कहा करते थे अपना ग़म बाँटकर दूसरों को भी ग़मगीन कर देना चाहिए। तो यार कहो न क्या बात है।”

अरविंद की खामोशी बता रही थी कि मेरी ये बात उसे छू गयी है। कुछ देर चुप रहने के बाद अरविंद कहता है वही ‘इक्कीस दिन’।

‘इक्कीस दिन’ अरविंद और उसकी माशूका की इक्कीस दिनों का प्रेम है जिस पर अरविंद ने कहानी भी लिखी थी। अरविंद का मानना था कि उसी इक्कीस दिन में उसने जिंदगी के सभी हसीन पल जी लिए। कुछ उतार चढ़ाव भरी इस इक्कीस दिनी कहानी का दुखान्त हुआ था मगर उनका प्रेम समाप्त नहीं हुआ था।

दोनों हृदय से आज भी एक दूजे को यूं ही चाहते हैं मगर उस इक्कीस दिन में ही इनकी प्रेम कहानी के आधिकारिक पतन की घोषणा हो चुकी थी। इक्कीस दिन का प्यार पहले दिन के ‘आई लव यू’ से शुरू हुआ और इक्कीसवें दिन के ‘मायूसी और खामोशी’ से ख़तम होता मालूम हुआ।

मैंने अरविंद का मन बहलाने के लिए और माहौल को हल्का करने के लिए एक पुराने और मजेदार किस्से की पेशकश की जिसको कामयाब न होता देख मैंने अनेक विषय बदलते हुए अरविंद को हँसाने की कोशश की जिसे अरविंद ने सिरे से खारिज़ करते हुए कहा- ‘बस करो।’

मैं ठहर सा गया और इस समय अरविंद को अकेला छोड़ना ही मुनासिब समझा। मैं उठा और दबे उल्टे पाँव वापस लौट गया।

– गोपाल यादव

 

Gopal Yadav
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