Ekakipan | Mid Night Diary | Raushan Suman Mishra

एकाकीपन | रौशन ‘सुमन’ मिश्रा 

रात के साढ़े आठ बज रहे हैं। दरवाजे पर डिबिया से आ रही हल्की रोशनी में अकेला सो रहा हूँ। झींगुर की झनझनाती आवाज मानों की मन में एक डर को पैदा कर रही है, बाड़ी में बचा एकलौते अमरूद के पेड़ मुझे निहार रहा है। शायद मेरे मौत की राहें देख रही हो, फेकन भाई के कुक्कुर के भौकने की आवाज आ रही ऐसा लग रहा है। शायद वो उनके जाने के वियोग में भौंक रहा है। रेडियो पर आकाशवाणी दरभंगा से बज रहे फाग बिरह के गीत मन को अंदर से मरोड़ रहा है।

अब हल्की नींद में देख रहा हूँ कि मैं टीसन पर बउआ के इंतजार में खड़ा हूँ। वो जनता गाड़ी से आने वाला है। चार साल बाद फगुआ में तो गाँव आ रहा है, तो खेलाबन को भी संग ले आए कुछ ज्यादा ही सामान होगा और साथ में कनिया, पोता-पोती भी तो होगी, जब से गाँव में लोगों का आनजान कम हो गया है। तब से रेलवे ने भी सात जोड़ी गाड़ी के जगह दो ट्रेन ही भेजती है।

ट्रेन की सिटी बजते ही स्टेशन मास्टर दोनो हाथ में झंडी लेकर खड़ा हो गया है ट्रेन प्लेटफार्म पर लग चुकी है लेकिन देख रहे हैं कि बउआ अकेले ही ट्रेन से निकला है पूछने पर बता रहा है कि अंकुश का एग्जाम है तो नही लाएं और हां सुनीता को भी तो गांव में कुछ अच्छा नहीं लगता है। इस कारण से नही लाये हैं, अगले साल देखा जाएगा. यह सुनते ही आंखों से आंसू आ रहे हैं, हाँ ये आंसू सच के हैं किसी स्वप्न के नही अब मैं जाग चुका हूँ. शायद ये सात साल पहले के स्वप्न थें उस समय में तो हाथ ने लाठी भी नहीं थामी थी चमड़े पर झुर्रियां भी नही थी।

लेकिन आज सब कुछ छूट रहा है बचपन के आधे दोस्त भी जा चुके हैं। यहां तक जीवनसंगिनी भी साथ छोड़ चुकी है उसके बिना आँगन भी काटने दौड़ रहा है इस भुतहा घर में जाने का मन नही करता है। चलितर व्यास के जाने के बाद से होली में ग्राम भ्रमण भी नही हो रहा है, जोगीरा गाने वाला कोई बचा नही है बरमथान पर कोई जमावड़ा नही जमता है डीह बाबा के गहबर पर कोई गाने वाला भी नही बचा है।

अब गांव अपने अस्तित्व को खोने के कगार पर है कुछ सालों में पूर्णतया ही समाप्त हो जाएगा, बस दस बारह मौत के इंतजार में रुकी हुई है।गिनकर तो तेईस लोग हैं जो बाहर नहीं निकले, एक एक कर सब खत्म हो जाएगा, हम दिनेस सुरेस सब चले जाएंगे, ये सारे घर महल सब खंडहर में बदल जाएंगे मतलब कुछ भी नहीं बचेगा बस बच जाएंगी इसकी कुछ स्मृतियाँ।

यह सब सोचते हुए मैं फिर से नींद में हूँ शायद उस निंद में, जिसके बाद फिर दुबारा कभी उठ नही पाउंगा. उस नींद में, जिसमे वो सारे लंगौटिये साथ में है. जिसमें सुलेखिया पुआ बना रही है जिसमे चलितर बरम, डीह गहबर पर जोगीरा गा रहा है।

 

 

-रौशन ‘सुमन’ मिश्रा 

 

Raushan Suman Mishra
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