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एक उम्मीद | अमन सिंह | #उन्मुक्तइंडिया

बीती शाम को चौराहे के उस नुक्कड़ से गुजरते वक़्त अगर कुछ साथ लौटा था तो वो थी एक उम्मीद! जो शायद मेरी नहीं थी, फिर भी मेरे साथ थी। चाय के दो घूट गले से उतरते ही मानो एैसा लगा जैसे जिंदगी का कोई कड़वा सच गले को चीरता हुआ सीधे दिल पर जा लगा। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सका, पता नहीं क्यों बढ़ते हाथों को किस अनजाने से शख्स ने रोक लिया। कुछ ही वक़्त बीता था कि मैंने खुद को खुद के अंदर की ही दो अलग आवाजों से लड़ते पाया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था मैं क्या करूं? कभी सोचता चलो एक मुस्कराहट भरा हाथ बढ़ा देता हूँ, फिर अगले ही पल लोग क्या कहेंगे का ख्याल मुझे खुद को रोकने पर मजबूर कर देता।

कहते हैं न दुवाओं की कोई शक्ल नहीं होती, शायद उस मासूम से चेहरे ने दुवाओं में मुझे मांग लिया था या फिर मेरी किसी कोरी सी दुवा में उसकी जिंदगी के रंग भर दिए थे उस ऊपर वाले… जो भी हो, पता ही नहीं चला कब उस मासूम सी मुस्कान की आँखों की को चुराकर मैंने उसे अपना बना लिया था। रोज़ की ही तरह ऑफिस से लौट आया था लेकिन आज खाली टिफ़िन और बैग के अलावा कुछ साथ था तो कुछ सुकून, मासूम सी मुस्कान, कुछ रंगीन हो चुकी कोरी सी दुवायें और एक उम्मीद!

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