Ek Paigaam - Independence Day Special | Mid Night Diary | Bhavna Tripathi

एक पैगाम | भावना त्रिपाठी | इंडिपेंडेंट डे स्पेशल

जय हिंद दोस्तों ,

मेरे परिचय में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि मैं इस भारत का बेटा हूं। मुझे जन्म तो मेरी मां ने दिया पर पाला यहां की धरती ने। जब मैंने आंखें खोली थी, तब मैं मां की गोद में था पर जैसे जैसे बड़ा होने लगा माँ इस जमीन में छोड़ने लगी मुझे।

इसी में उठा,इसी में गिरा,इसी में चला और इसी में दौड़ा।आज इसी के लिए अपनों को छोड़ा। पता ही नहीं चला कि कब इस ज़मीन से इतनी मोहब्बत हो गई थी कि इसके लिए मैं अपनों के ही खिलाफ़ हो गया था। दरअसल मैं एक फौजी हूं जब कोई मुझ से पूछता है कि मैं क्या करता हूं, तब बताते हुए मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है कि मैं इस भारत मां की रक्षा करता हूं।

मैं अपने देशवासियों की रक्षा करता हूं। मुझे आज भी याद है मां के वो आंसू, जो तब बहे थे, जब उसे पता चला था कि मैं फौज में जा रहा हूं। पिताजी ने भी सख्त़़ मना कर दिया था पर मेरी ज़िद के आगे भला किसी की चली थी जो अब चलती। अपने लंबे चौड़े भाषण से उनको आख़िरक़ार मना ही लिया था मैंने।

थोड़े स्वार्थी हो गए थे ना वो? जानता हूं, पर उनका भी कसूर नहीं है। एक छोटी बहन ही तो है मेरी सिर्फ और एक मैं,और मैं भी उन से दूर रहूं, यह नहीं चाहते थे वो, पर मेरी ख़ातिर यह कुर्बानी देने के लिए भी राजी हो गए थे वो।हमारी नौकरी वह आम नौकरियों की तरह 9:00 से 5:00 वाली बिल्कुल नहीं है जिसने छुट्टियां,घूमना फिरना, मां बाप के साथ बातें, दोस्तों के साथ मस्ती होती है।

हमें चौबीसों घंटे तैनात रहना पड़ता है क्योंकि पता नहीं कब दुश्मन हमला कर दें और हमारी मां की आबरु पर संकट आ जाए। हम रात में सोते नहीं बल्कि सड़कों पर उतरते हैं ताकि सारा देश बेख़ौफ़ हो कर सो सके। आज सारा देश हिंदू मुसलमान और जात धर्म न जाने किन किन फ़िज़ूल की बातों को लेकर लड़ रहा है।

मैं ना तो हिंदू हूं और न ही मुसलमान हूं। मैं एक फौजी हूं।जब मैं सीमा पर तैनात होता हूं, तब मुझे ना हिंदू की रक्षा करनी होती है और ना ही मुसलमान की, मुझे सिर्फ अपने मुल़्क के लोगों की रक्षा करनी होती है, जो हम फौजियों के लिए दुआ करते हैं।

सीमा पर यह तो किसी की कोई जात नहीं होती, फिर आप सब ये जात धर्म की बातें क्यों करते हो? जिस वक्त सारा देश दीवाली मना रहा होता है,हम रोशनी से दूर किसी बर्फीले पहाड़ पर एक दिए की रोशनी भर गर्माहट पाने को तरस रहे होते हैं ।जब सारा देश होली के रंगों में भीगा होता है, तब हमारे चेहरे पर सिर्फ़ लाल रंग होता है, यह वो ख़ून होता है, जो हम सब आपके लिए हंसते-हंसते बहा देते हैं।

हर रक्षाबंधन में छोटी की डांट सुननी पड़ती है।, जब से फौज में भर्ती हुआ, तब से एक बार भी कलाई में राखी नहीं बंधवा पाया। क्या करुं ,काम ही कुछ ऐसा है ।मां को हमेशा यही समझाता हूं कि वह मेरी चिंता ना करें। यहां सब बहुत ख़्याल रखते हैं मेरा। एक जन की दो दिन पहले ही शादी हुई है और उसे तुरंत आना पड़ा। एक का बेटा 2 साल का हो गया है पर आज तक वह अपने पापा से नहीं मिला।

एक जनाब तो ऐसे हैं जो जब आते हैं, तब उनका बेटा उनसे रुठ जाता है क्योंकि वह उसके दोस्तों के वालिदों की तरह ना तो उसके साथ रहते हैं ,ना घुमाते हैं और ना ही ईद उनके साथ मनाते हैं। आप सब तो अपने-अपने परिवार, रिश्तेदार और खैरख्वाह के साथ हो पर हम न जाने कितने-कितने दिन अपनों की आवाज तक नहीं सुन पाते। शहीदों की लाशेेेंं जब उनके घर जाती है तो उनके मां बाप के आंसू,उनकी बेवाओं के वो चूड़ी तोड़ते हाथ,उनके बच्चों की चीखें, रूहें कँपा देने के लिए काफी होती हैं।

जब छुट्टी में घर वालों से मिलता हूं, तब यही लगता है कि शायद यह आखिरी मुलाकात हो उनसे।अगली बार न जाने मैं आऊंगा या मेरी लाश। अपनी आंखों की नमी को छुपा कर उन सबको चुप कराना पड़ता है। हम सबकी इस कुर्बानी को ज़ाया मत जाने दीजिए। आप सब आपस में ही अपने दुश्मन बने जा रहे हैं तो हम सब का यह प्रयास व्यर्थ ही जाएगा। जब तक हम अपने घर में ही शांत नहीं रहेंगे,तब तक बाहर के लोग तो इसका फायदा उठाएंगे ही।

मेरी शादी होने वाली है। उसके हाथों में मेहंदी भी रच गई है। दो दिन पहले ही उससे बात हुई थी, बहुत खुश थी वह। मुझे दरअसल कल ही निकलना था पर अचानक छुट्टी रद्द हो गई और मुझे लड़ने जाना पड़ा।इसीलिए तो आज जा रहा हूं…

बस फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि आज मैं तिरंगे में लिपटा हूं। मैं जा चुका हूं दोस्तों ,हमेशा हमेशा के लिए। फख़्र है मुझे कि मैंने अपनी मां के लिए जान दी। आज तक कभी डरा नहीं मैं, पर ना जाने क्यों आज बहुत डर लग रहा है।

मेरी लाश देख कर क्या होगा उनका,जिनका मैं एकलौता बेटा था? क्या होगा उसका, जो हाथों में मेहंदी लगाए, मेरा इंतजार कर रही है? क्या होगा उसका,जो हर साल रक्षाबंधन में मुझे राखी भेजती थी?अब किस को बांधेगी वो राखी? अब जा रहा हूं मैं, क्योंकि हिम्मत नहीं है मुझमें कि आगे कुछ देख पाऊं।

बस मेरे देश का ख्याल रखना। अधूरा सपना पूरा हो गया मेरा, मेरा कफ़न तिरंगा है और मेरी जान मैंने अपनी मां पर न्योछावर कर दी।

जय हिंद

-भावना त्रिपाठी

 

Bhavna Tripathi
Bhavna Tripathi

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15 thoughts on “एक पैगाम | भावना त्रिपाठी | इंडिपेंडेंट डे स्पेशल

  1. Dil ko gahraiyon tak hila dene wali story. Heart touching & fantastic. Really superb. Jai Hind, vande matram.

    1. शुक्रिया जीजू 3 साल पहले की कोशिश थी, अब की कुछ और अच्छा लेकर आऊंगी। जय हिंद।

  2. बिलकुल सटीक कहानी एक फौजी की। बहुत अच्छा लिखी हो।

  3. Very nyc…..really story is too good…
    Keep it up dear Bhawna aise hi achchi achchi stories likhati rahu…..tumhare ujjwal bhavishy ki kamna hai ishwar se…..

    1. तुम लोगों के प्यार और साथ की जरूरत है चित्रांशी ।शुक्रिया

  4. Kya baat hai
    Ek fauji ka dard bayaan karne ke saath, unn logo ko aaina bhi dikhaya jo inn Jawano ki kurbaniyo ko zaya karte hai bewajah ki baaton par lad kar
    Badhia likhthi hai aap
    Aise hi likhti rahiye, kamal karengi Aap
    Jai Hind

    1. शुक्रिया सर कोशिश जारी रहेगी लिखने की भी और कमाल करने की भी।

    1. शुक्रिया सर, आपके शब्द बहुत मायने रखते हैं

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