Ek Kahani | Mid Night Diary | Shreya Levy

एक कहानी | श्रेया लेवी

आओ सुनाऊँ तुम्हें एक कहानी,

एक प्रथा थी बहुत पुरानी…

तीन लफ़्ज़ थे कहने ज़ुबानी,

फिर हो जाती थी, ख़त्म कहानी।

 

ना कोई राजा, ना कोई रानी

क्या थी ये मनमानी?

तलाक़-ए-बिद्दत से मामला

उठा था… हो गई उसकी मनाही।

 

क्या यही ख़त्म हो गयी कहानी?

तलाक़ शब्द था छोटा सा…

कर जाता था मनमानी।

 

एक रिश्ते को झट से

ख़त्म कर मचाता था तबाही।

क्या ये बात थी छोटी सी!

 

या थी ये बड़ी कहानी?

था ये एक धर्म का क़िस्सा या,

थी ये हर धर्म की कहानी?

 

क्या बस तलाक़! तलाक़! तलाक़!

पर रोक लगाने से मिल जाएगी

 

हर औरत को ख़ुशहाली?

पन्ने पलट के देखते है,

क्या होती है तलाक़ की तबाही?

तलाक़ शब्द है इतना बड़ा

की मिटा देता था अस्तित्व पुरानी।

 

ना सधवा, ना विधवा…

मिट गयी थी हर पहचान पुरानी…

हाँ! ये एक धर्म की बात नहीं

है हर धर्म की कहानी।

बात उठी है तो आगे बढ़ेगी

अब बस बहुत हुई मनमानी।

 

-श्रेया लेवी

Shreya Levy
Shreya Levy

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