Ek Kagaj | Mid Night Diary | Avnish Kumar | #UnmuktIndia

एक कागज | अवनीश कुमार | #उन्मुक्तइंडिया

“कागज़ दिखाओ गाड़ी के” ऐसा बोल कर किसी चौराहे पर खड़ा पुलिस वाला आते जाते लोगो से चाय पानी का जुगाड़ कर लेता है।

मै किसी नेता की तरह कागज़ की इस दशा पर बात न कर । मै उन कागज़ के टुकड़ो की बात करूँगा जो आज मैने अपने कॉलेज जो की एक इंजीनियरिंग कॉलेज है के इर्दगिर्द देखे है। यहाँ कागज़ों की अजब सी दौड़ चलती है, जहाँ कागज़ी घोड़े सरपट दौड़ते है । मै भी उस दिन कुछ कागज़ ओह सॉरी ! पैसे निकालने एटीएम में गया।

कुछ जोड़े तो टिश्यू पेपर ( एक प्रकार का कागज़) सभ्यता का अजीब प्रदर्शन कर रहे थे, जो दूर से प्रेमालाप सा प्रतीत होता था परंतु इसमें प्रेम के एक रूप श्रृंगार रस का लेश मात्र भी नहीं था।

और यह बात इस तथाकथित प्रोयोगात्मक युग में कही तक ठीक भी बैठती थी। अरे अब कहाँ किसी को चहरे में चाँद और महबूब की ज़ुल्फो में बदल दिखते है।

इन्ही लोगो के आस पास कुछ छात्रों के हाथ में सपनों/जीवन की लौ की कालिख से पुते कुछ कागज़ जिन्हें पढ़ाई की भाषा में नोट्स कहते है ,भी थे। ये वो कागज़ थे जिन पर जिम्मा थे इन छात्रो को बेहतर इंसान बनाने का, मगर क्या किताबों से भरी लाइब्रेरी से ही अच्छे इंसान निकलते है।

इस भीड़ से दूर एक और दुनिया थी जिसमे एक 8-9 साल की लड़की दो बाँश के सहारे टीकी रस्सी पर करतब दिखा रही थी। उम्मीद वही थी कुछ कागज़ों की, कुछ सिक्को की मगर जब दुनिया में लोगो का पैमाना ही ये चंद सिक्के/नोट हो तो भला कोई अपनी शान में से कुछ किसी को देगा और फिर ऐसा करने से उसके पायदान में भी गिरावट आ जायेगी ।

कुछ पल के बाद जब वो नन्ही आँखे उम्मीद के धरातल से उतार कर, यथार्त की जमीन पर आई ।

तो मैने देखा उन नन्हे हाथो में एक पुराना सा कटोरा था जिसमें कुछ छुट्टे पैसे पड़े थे, वो लड़की बारी बारी से सबके आगे उस कटोरे को कर रही थी। जब मेरी तरफ वो हथ बढे तो में अजीब ऐ उलझन में पड़ गया।

एक तरफ जेब में पड़े वो 500 rs के दो नोट और सामने मुँह फैलाये पूरा महीना ,दूसरी तरफ वो नन्ही उम्मीद भरी आँखे। एक तरफ मानवीय भावनाओ से भरा दिल और दूसरी तरफ भौतिक जीवन जिसकी जरूरते भी पूरी करनी थी।

ऐसे में ज्यादातर जरूरत जीत जाती है या यूँ कहे तो आज के दौर में भौतिक संसार हमारी भावनाओं पर अक्सर हावी रहता हैं।

उस दिन भी वही हुआ ,अगले पल ही मेरे हाथ में वो 500rs के नोट थे और आँखो में उस नन्ही सी बच्ची की सूरत। मै कागज़ के पैमाने में उस परिवार से जीत गया था लेकिन मेरी जीत की निशानी ये नोट मेरे मन और हाथ दोनों को जला सा रहे थे।

 

-अवनीश कुमार

 

Avnish Kumar
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