Ek Din | Mid Night Diary | Veebha Parmar

एक दिन | विभा परमार

तुम सिर्फ़ मुस्कुरा रहे हो
और मैं,
रिसती हूँ रोज़
तुझे याद नहीं पर मुझे याद है तेरा फरेब

जिसके दाग़ मेरे अंतर्मन में छपे हुए है
जिससे मैं और मेरी आत्मा क्षतिग्रस्त है

लेकिन तुम हो कि, मुस्कुरा रहे हो
समझ आ रहा है मुझे कि
तुमने अपने खालीपन को भरने के लिए मेरा साथ लिया था
और एक दिन!

तुम हवा से बनकर कहीं उड़ गए
मुझसे बेख़बर हुए
मैं ताकती रही

वो गली,वो रास्ता,वो सड़के, और
वो दरवाजा
जहां रहती थी तेरे आने की उम्मीद

लेकिन तुम्हारी बिसरी यादों के अलावा,
तुम लौट के नहीं आये
इक चट्टान ही तो थी मैं

जिसको तूने अपनी खुशबू से पिघलाना सिखलाया
लेकिन अब ये चकनाचूर हो गई
तन्हाईयों, शिकायतों, और
ख़ामोशी के चलते!

 

-विभा परमार

 

Veebha Parmar
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