एक दिन की ख़ुशी

एक दिन की ख़ुशी | अलका

विनय और शोभी अपने बेटे रोचक के जन्मदिन की पार्टी में होने वाले खर्च का अनुमान लगा रहे थे। विनय ने मेहमानों की लिस्ट तैयार कर ली थी उनके लिए रिटर्न गिफ्ट देना और होटल का खर्च..सब मिलाकर 20 हजार का एस्टिमेट बना था।

“शोभी! मैंने रोचक के बर्थडे पर आने वाले मेहमानों की जो लिस्ट बनाई है उसे एक बार चेक कर लेना। कोई नाम छूट तो नहीं गया है?”

शोभी ने लिस्ट देखी और बोली,
“हाँ लिस्ट तो सही है। लगभग सभी नाम हैं। बस मेरी दो तीन सहेलियों के नाम नहीं हैं।”

“क्या???? तुम्हारी सहेलियाँ!!!! जल्दी नाम बोलो अभी लिस्ट में ऐड करता हूँ। इतनी बड़ी गल्ती मुझसे कैसे हो गयी?”

विनय को शरारत सूझ रही थी। शोभी उसकी एक्टिंग देखकर हँस पड़ी।
दोपहर को रोचक ने स्कूल से आते ही पूछा,
“मम्मी! मेरे बर्थडे पर पार्टी होगी?”

“हाँ बेटा! आज ही मैंने और तुम्हारे पापा ने पार्टी की पूरी प्लानिंग कर ली है। तुम्हें अगर किसी दोस्त को बुलाना हो तो बता देना।”

“नहीं मम्मी! मुझे किसी को नहीं बुलाना है। और न ही होटल जाकर पार्टी करनी है। मम्मी! आज मेरी मैम ने कहा है कि हमें अपना बर्थडे अनाथालय में जाकर मनाना चाहिए। वहाँ बच्चों को पार्टी देनी चाहिए।

मम्मी! क्या मैं अपना बर्थडे किसी अनाथालय में जाकर नहीं मना सकता?
शोभी सोच में पड़ गयी। वो मन ही मन बोली,
“रोचक की मैम ने बहुत अच्छी बात कही है। तो क्या हमें किसी अनाथालय में जाकर रोचक का बर्थडे मनाना चाहिए? हाँ ये हो सकता है।”

शाम को शोभी ने विनय को ये बात बतायी। विनय सहर्ष तैयार हो गया। वो शोभी से बोला,
“मैं तुम्हें बीस हजार रुपये दे दूंगा। तुम इंतजाम कर लेना। लेकिन हाँ वहाँ अपनी सहेलियों को जरूर बुला लेना।”

ये कहकर विनय ने आँख मार दी। शोभी की हंसी छूट गयी।

अगले दिन विनय और शोभी “कपिगृह बालघर” जाकर वहाँ की संचालिका मिसेज़ गोयल से मिले। वो इसके लिए तुरंत तैयार हो गयीं। दस दिन बाद रोचक का बर्थडे था। इस बीच शोभी ने सारी प्लानिंग कर ली। वो रोचक का बर्थडे अनाथालय में मना तो रही थी लेकिन एक अलग तरह से। उसका काम चाहे छोटा हो या बड़ा, लेकिन होता था सबसे अलग हटकर।

शोभी ने मिसेज़ गोयल से मिलकर सारी तैयारी कर ली। वहाँ की सजावट, खाने पीने के सारे इंतजाम के लिए मिसेज़ गोयल को पैसे दे दिये थे। बाकी जो कुछ करना था उसको ही करना था। इस बीच वो कई बार कपिगृह बालघर गयी थी और चुपचाप तैयारी करती रही।

आज वो दिन आ गया जिसका इंतजार दस दिन से सब कर रहे थे। सुबह से ही रोचक बहुत उत्साहित था। आज तो उसे कपिगृह बालघर जाना था और वहाँ के बच्चों के बीच अपना बर्थडे मनाना था। दोपहर को ही विनय, शोभी और रोचक वहाँ पंहुच गये। केक का ऑर्डर पहले ही दे दिया गया था।चार बजे आना था केक।

अनाथालय के बाहर से ही सजावट दिखाई दे रही थी। अंदर का नजारा बहुत ही अलग था। चारों तरफ बच्चों के हाथ के बने पोस्टर लगे थे। फूल पत्तियों से सारी सजावट की गयी थी। हर बच्चा रोचक का बर्थडे मनाने के लिए उत्सुक था।

शोभी ने विनय और रोचक को वहाँ बिठाया और गाड़ी की चाभी लेकर बाहर चली गयी। और जब वापस आई तो उसके हाथों में कई पैकेट थे। उसने हर बच्चे को उसका नाम लिखा पैकेट पकड़ा दिया और कहा कि वो जाकर कपड़े बदलकर आएं। बच्चे मिसेज़ गोयल का मुँह देख रहे थे। उन्होंने जैसे ही सहमति में सिर हिलाया वैसे ही बच्चे अपना अपना पैकेट लेकर अंदर भागे।

आधे घंटे बाद जब वो तैयार होकर बाहर आए तो वहाँ एक सुखद नजारा था। हर बच्चे के शरीर पर उतने ही महँगे कपड़े थे जितने महँगे रोचक ने पहन रखे थे। विनय आश्चर्य से सबको देख रहा था। शोभी ने सभी बच्चों को बर्थडे कैप पहनने को दी। रोचक सहित सबकी कैप एक सी थी।

तभी केक आ गया। बड़ा सा केक था। बीच मेज पर रखकर शोभी ने उसपर सोलह मोमबत्ती लगा दीं। विनय बड़ी दिलचस्पी से शोभी को देख रहा था। इस वक्त शोभी सिर्फ़ रोचक की ही नहीं बाकी पन्द्रह बच्चों की भी माँ लग रही थी।

शोभी ने बच्चों से कहा, “तुम सब एक एक मोमबत्ती बुझाओगे और मिलकर एक साथ केक काटोगे।”
बच्चे ही नहीं इस बार मिसेज़ गोयल भी चौंक गयीं। वो आश्चर्य से बोलीं, “शोभी जी! आज तो आपके बेटे रोचक का बर्थडे है। फिर बाकी बच्चे केक क्यों काटेंगे?”
” मिसेज़ गोयल! रोचक तो हर साल अपना बर्थडे मानता है। हर साल केक भी काटता है और हर साल उसको ढेरों गिफ्ट भी मिलते हैं।”

शोभी थोड़ा रुकी और एक छोटी बच्ची को गोद में उठाते हुए बोली, “हम तो आज रोचक का बर्थडे मनाकर चले जाएंगे। लेकिन सोचिए बाद में क्या इनके मन में नहीं आएगा कि हम इस तरह अपना बर्थडे नहीं मना सकते क्या ?

“मिसेज़ गोयल! आप ही बताइए, इनका क्या ये कसूर है कि इनके माता पिता नहीं हैं? क्या इनको खुशियाँ मनाने का अधिकार नहीं है?

एक दिन ही सही इनको ये एहसास होना चाहिए कि इस दुनियाँ में ये भी खास हैं। इनको भी खुशियाँ पाने का उतना ही अधिकार है जितना रोचक को है।”

मिसेज़ गोयल की आँखें नम हो गयीं। अक्सर वहाँ लोग अपने बच्चों का बर्थडे मनाने आते थे। वहाँ के बच्चों को खाना पीना खिलाते, और लौटते में उनको रिटर्न गिफ्ट देते और चले जाते। लेकिन बाद में बच्चों की आँखों में जो सूनापन होता उसे मिसेज़ गोयल कभी न तो देख पाईं और न ही महसूस कर पाईं।

आज शोभी ने उनके मन में बच्चों के लिए प्यार और भी जगा दिया। उनको शोभी के रूप में एक सच्ची माँ सामने दिख रही थी। एक ऐसी माँ जो सिर्फ माँ होती है जिसके लिए हर बच्चा उसका अपना होता है।

तभी रोचक गाड़ी से बच्चों को देने के लिए गिफ्ट ले आया। वो एक एक बच्चे को गिफ्ट देता जा रहा था और सबको हैप्पी बर्थडे बोलता जा रहा था।

सारे बच्चे खुशी से झूम उठे। वो जाकर शोभी से लिपट गये। उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव देखकर शोभी की आँखें खुशी से चमक उठीं। एक दिन के लिए ही सही, शोभी ने बच्चों को वो सच्ची खुशी दी थी जिसके वो हकदार थे।

-अल्का श्रीवास्तव

अल्का श्रीवास्तव
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