Ek Dafa | Mid Night Diary | Anupama Verma

एक दफ़ा | अनुपमा वर्मा

एक दफा कुछ ऐसा सोचो
जो सोचा नही कभी
एक दफा कुछ ऐसा करो
जो किया नहीं कभी
आज एक और मन्नत का धागा बांधो
पर इस दफा अपने लिए नही
एक अजनबी के लिए
जिसे तुम जानते ही नही
क्योकि जो तुम्हारे पास है
जिसकी तुम्हे कद्र नही
वो उसे पाने के लिए भी बैठा होगा
अभी किसी सिग्नल पर कही
एक दफा
एक मन्नत का धागा
उसके लिए भी

एक दफा कुछ ऐसा सोचो
जो सोचा नही कभी
एक दफा कुछ ऐसा करो
जो किया नहीं कभी
आज एक नयी दिशा पकड लो
पर इस दफा अपनी मंजिल पर जाने के लिए नही
उस मुसाफिर के लिए
जिसका सफर अब ज्यादा बाकी नही
वो खुद सफर पर निकला भी नही
पर उसे धकेल दिया गया है
जिसने महज प्यार लुटाया उम्र भर
आज वही वृद्धाश्रम ढूँढ रहा है
एक दफा
एक कदम
उसकी दिशा मे भी

एक दफा कुछ ऐसा सोचो
जो सोचा नही कभी
एक दफा कुछ ऐसा करो
जो किया नहीं कभी
आज एक खत लिख दो
पर इस दफा अपने किसी खास के लिए नही
उस सैनिक के बेटे लिए
जो हर रोज स्कूल से आते हुए वही रस्ता पकडता है
जो डाकखाने वाली गली से होकर गुजरता है
जो कभी मांगता था खिलौने
आज उसे सिर्फ पापा का खत चाहिए
एक दफा
एक खत
उस मासूम के लिए भी

 

-Anupama Verma

 

Anupama verma
Anupama Verma

220total visits,2visits today

Leave a Reply