Ek Cup Chai | Mid Night Diary | Deepti Pathak | #UnmuktIndia

एक कप चाय | दीप्ति पाठक | #उन्मुक्तइंडिया

हर शाम office के बाद सामने की चाय की थड़ी पर बैठ कर चाय पीने की जैसे कोई लत सी लग गयी थी… मेरे हर दिन का हिस्सा सा हो चला था ये हर शाम को चाय की चुस्कियों के साथ सड़क की चहल पहल को देखना और अपनी थकान को छूमंतर करना, याद है मुझे वो दिन जब मैंने चाचा को चाय का order दिया था तो उन्होंने चाय का cup थमा एक लगभग 10 साल के बच्चे को मेरी और भेज दिया।

वो बच्चा मुस्कुराता हुआ चाय के साथ एक बिस्कुट का पैकेट मेरे सामने रख कर दूसरे कामों में लग गया,,मेरी आँखें मानों उस बच्चे का पीछा कर रही हो,जहां वो जाता मेरी गर्दन उस ओर ही घूम जाती।

ऐसे ही कई शामें गुज़र गयी,फिर एक शाम जब वो बच्चा आया जिसका नाम अब छोटू हो गया था , किसी ने उससे उसका नाम पूछने की तकलीफ नही की बस उसका नामकरण कर दिया था जिसमें मैं भी शामिल था। खैर जब उस शाम वो चाय का कप लेकर आया तो मैंने उसे पूछा ,छोटू, -तू थकता नही है क्या कभी? जब देखो फिरकी की तरह दौड़ता रहता है।

तब छोटू ने जवाब दिया था कि भैया ये पेट की दौड़ है अगर पैरों की होती तो शायद थक भी जाता, पर मेरे पास 4-4 पेट है तो मैं थकता नही हूँ,और हंसता हुआ फिर अपने काम में लग गया,पर मुझे कुछ भी समझ ना आया था,बिस्कुट तो मैं उसे रोज़ ही देता था उस दिन मैंने उसे 10rs भी दिए थे,और उसने थोड़ा शर्माते हुआ ले भी लिए थे।

अगली शाम जब मैं चाय पीने गया तो चाय का cup लेकर चाचा आये,मैंने उन्हें देख कर जैसे खुश ना हुआ हुँ उस लहज़ें में पूछ बैठा “आज छोटू कहाँ गया” तो उन्होंने बड़ी ही गंभीरता से कहा “गांव गया है” पर मानो जैसे इतना जान लेना मेरे लिए काफी ना हो मैन 1 के बाद 1 सवालों की झड़ी लगा दी।क्यों?,वापस कब आएगा,? ऐसे अचानक कैसे चला गया,?उन्होंने मानो झल्लाते हुए कहा हो ,आ जायेगा बाबूजी आप चाय पीजिये।

फिर ऐसे ही कुछ दिन गुज़र गए पर छोटू नही आया, रोज़ चाचा से पूछ लिया करता था पर वही जवाब मिलता था। बीच में कुछ शामें बस बाहर से ये देख कर ही निकल जाता था कि छोटू आया या नही।

पर वो कहीं नही दिखता था।फिर एक शाम चाचा ने ही आवाज़ लगा दी छोटू आगया है साहब आजाओ अब तो चाय पीने,मैं लगभग भागता हुआ सा अंदर जाकर बैठ गया और छोटू को इधर उधर नज़रों से ढूंढता हुआ चाय का इंतज़ार करने लगा।

थोड़ी देर बाद छोटू चाय लेकर आया,,पर ये क्या ,,छोटू का चेहरा मुरझाया हुआ सा था, ना आंखों में वो चमक ,ना होंठो पर वो मुस्कुराहट ,बहुत ही उदास और थका हुआ लग रहा था। तो मैंने उसे अपने पास बैठाते हुआ पूछा कि क्या हुआ थक गया? तू तो बोलता था कि तू थकता नही,आज क्या हो गया,, तो वो बोला भैया बोला था ना पेट की दौड़ है पर अब बस 2 ही पेट रह गए तो थक गया हूँ अब मैं और उन्ही उदास आंखों से उठ कर चला गया और अपने काम मैं लग गया।

मैं चाय पीते हुए पूरा टाइम उसे ही देखता रहा और उसकी बात को सोचता रहा पर उसकी बात अब भी समझ नही आई थी मुझे,,फिरकी की तरह इधर उधर दौड़ते हुए काम करने वाला छोटू आज मानो बूढा हो गया हो… मैं बिल देने के बहाने चाचा के पास गया और पूछा कि ,ये छोटू को क्या हो गया है, तो चाचा ने बताया कि वो गांव इसलिए गया था क्योंकि उसके मां बाबा बीमार थे और वो दोनों ही खत्म हो गए, आज ही लौटा है अपनी छोटी बहन को साथ लेकर, मेरे कदमो तले जैसे ज़मीन खिसक गई।

आँखों के सामने अंधेरा छा गया हो और कानों में बस छोटू की ही आवाज़ गूंज रही थी”भैया पेट की दौड़ है थकता नही हूँ मेरे 4 -4 पेट है। हां भैया थक गया हूँ अब 2 ही पेट रह गए है।

उस शाम मैं घर जा ही नही पाया,वहीं बैठा बस उस बच्चे को देखता रहा और मानो खुद से कोई वादा कर लिया हो, की ये बच्चा अब छोटू नही रहेगा, अब ये ज़िन्दगी की दौड़ दौड़ेगा ज़रूर पर ऐसे नहीं।

मैंने अगले ही दिन छोटू जिसका नाम अवि था और उसकी बहन अविका का एडमिशन एक स्कूल में करा दिया और होस्टल में रहने की व्यवस्था भी।अब मैं हर हफ्ते अवि और अविका से मिलने जाता था और जिंदगी की पेट की दौड़ को भूल कर सकूं के पलों को जीता था।

ये अवि और अविका भी एक दिन बड़े होंगे ज़िन्दगी को जियेंगे पर छोटू बनकर नही,पर ऐसे बहुत से छोटू अब भी हर दिन सुबह पेट की दौड़ में शामिल होते है हर रात माँ के आंचल में सोते है और हर सुबह उठकर फिर वही समझदार छोटू होते है।

( बहुत आसान होता है दूर से किसी छोटू को देख मुस्कुराना उसके अंदर छुपे उस ज़िम्मेदारियों के बोझ को जिसके तले वो दबता जा रहा है उसे कोई उतारे तो बात बने)

 

-दीप्ति पाठक 

 

 

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