Ek Baag Me | Mid Night Diary | Amita Gautam

एक बाग़ में | अमिता गौतम

कोमल सी पखुड़िया, रगं उसका लाल,

सौन्दर्य मे वो सबसे कमाल,

है महक उसकी मनमोहक नशीली,

एक बाग मे सुमन अकेली..

न अहंकार, न कोई कमी,

उसको प्यारी इस देश की ज़मी,

हंसती,मुस्कुराती, चंचल मन पहेली,

एक बाग में सुमन अकेली,

 

है स्वभाव से थोड़ी-सी शर्मीली, एक बाग मे सुमन अकेली,

 

थी एक तुफ़ान के बाद की शान्ति,

इसके लिए उसने करी थी क्रान्ति,

अब बस मौन खड़ी मिली ,

एक बाग मे सुमन अकेली,

देख रही इधर-उधर लेकर आँखो मे आस,

था नहीं कोई अब उसके पास ,

खो गये सब दोस्त उसके

जिसके साथ थी उसने आँख मिचोली खेली,

एक बाग मे सुमन अकेली,

खो गयी थी हंसी उसकी, खो गया विश्वास,

चेहरे पर चमक नहीं, अन्दर से उदास,

न जाने कौन कौन सी थी परिस्थिति उसने झेली,

एक बाग मे सुमन अकेली…

 

-अमिता गौतम ‘माही ‘

 

Amita Gautam
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2 thoughts on “एक बाग़ में | अमिता गौतम

  1. nice poem composed miss amita.
    i am also published my poem here.
    but i have no idea. that how can
    plesss guide me if have u time.

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