Ehsaas!

Ehsaas!

मैं चाहता हूँ, उसे हर बात से एहसास हो कि मैं ही नहीं, मेरी पूरी दुनिया उसकी मुन्तज़िर है। उसे कहना कि मेरे दिल की गुस्ताखियों को नज़रंदाज़ कर दे। माना कुछ अधूरी सी शिकायतें हैं, रुके हुए लम्हें की कुछ ख्वाहिशें हैं… जो बस रेत की तरह फिसलती जा रही हैं। तेरे काजल की छाव में छुपे हर अश्क में देखा था, मैंने चेहरा मेरा… लेकिन वो किसी ख्वाब में मुकम्मल न हो सका।
लेकिन तुम्हारा ख्वाब अब भी ख्यालों की भीड़ के उस कोने में सहमा खड़ा है। पता नहीं किस बात का इन्तजार है उस जर्जर से होते ज़ज्बात को, जो उस एक ख्वाब के मुकम्मल होंने के इन्तजार में है, जो तुमसे जुड़ा है। चाहता है, वो खुद को पूरा कर लेना बस कोई एक बार पलट वापस आये तो सही… बस एक और बेनाम सा ख़त तुम्हारे नाम उन अधूरी बातों के साथ जिन्हें मैं किसी से कह नहीं पाता।

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