ड्रॉप्स एंड यू | अमन सिंह

पिछली रात बारिश आई थी, कुछ हवा के झोकों के साथ.… बारिश की नन्हीं नन्हीं मचलती बूंदें जब इस जमीं के आँचल को छूती बस एक खुशबू दिल के करीब से गुजर जाती। बारिश की बूंदें, रात का वक़्त, ठंडी हवा के झोंके और मैं सब कुछ तो तुम्हारी ही पसंद का था, नहीं शायद मैं नहीं… तुम मुझे पसंद ही कहाँ करती थी।

चाहता तो मैं था तुम्हें दीवानों की तरह, प्यार तो मैं करता था तुमसे, आशिकों की तरह… हर बार एक ही सवाल जो खुद से पूंछता हूँ मैं.… क्यों? आखिर क्यों? मैं ही तुम्हें इश्क़ करूँ और इज़हारे इश्क़ भी? क्या जवाब है तुम्हारे पास?

रहने ही दो बेवजह के सवालों के जवाब सोचने से कुछ हासिल नहीं होगा। जैसे सिर्फ बारिश लौटकर नहीं आई, बीती जिंदगी के कुछ पुराने धुंधले से किस्से लौट आये जिंदगी में.. नहीं जानता कि तुम इस बारिश से मिल पायी या नहीं लेकिन कमरे के पास के झरोके से बारिश के छीटे जब मेज पर रखी डायरी पर पड़े तो मानो ऐसा लगा जैसे तुम्हारे बालों से आती भीनी खुशबू मेरी सांसों को छू गयी।

जब मिटटी से खुशबू उड़ी तो बस तुम्हारा ही ख्याल आया मुझे और आँख बंद करते ही मैं उसी जगह पहुँच गया जो तुम्हें बेहद पसंद थी, ट्यूलिप के बगीचे….. तुम्हें वह फूल पसंद थे और मुझे उनके साथ तुम। हवा के झोके से जब कुछ बूँदें मेरी पलकों पे आ गिरी तो बस पलकें खुद को रोक न पाई और बरश गयी।

मेरे भीतर मेरे बाहर दोनों ओर सिर्फ बूंदें थी फर्क सिर्फ इतना था कि आसमान से गिरती बूंदों से तुम याद आई और तुम्हारी याद से पलकों में बूंदें… बस फर्क सिर्फ इतना सा ही था। वाकई आज सिर्फ बारिश नहीं लौटी, उसके साथ लौट आये कुछ पुराने किस्से मेरे और तुम्हारे..

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