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दोस्ती और मज़हब | मुसाफिर तंज़ीम | आल रिलिजनस आर वन

हाँ अभी भी थोड़ा सा बच्चा हूँ
नहीं समझना चाहता हूँ

ये धर्म जाति ऊंच नीच
अमीर गरीब की बारीकियों को
और मेरा दोस्त भी अभी बच्चा है

घरवाले दोनो के कहते हैं
अब तो बड़े हो जाओ
और हम दोनो कहते हैं
हो तो गए हैं

आज भी वो शाम को
मेरे घर की चाय जरूर पीता है
और मैं सुबह उसके यहाँ का
पोहा खाये बिना नहीं हिलता हूँ

घर में दोस्त हो चाहे न हो
घर तो दोस्त का ही है
तो बस उसका चाय पर पूरा हक है
और मेरा पोहे पर

त्योहार तो कभी कभी आते हैं
और उस समय सभी के दिल में
प्यार कुछ ज़्यादा ही उमड़ता है
तब तो हम एक दूसरे को घास भी नहीं डालते

दोनो के घरवाले ही प्यार पूरा कर देते हैं
पर उन आम दिनों में पता नहीं सबका
प्यार जाने कहाँ चला जाता है

जैसे मौसमी बारिश आई और चली गयी
तब हम दोनों शैतान दूसरों के दिलों से
खोद खोद कर प्यार निकालते हैं
जैसे मेरा दोस्त मेरे पापा से चॉकलेट के पैसे मांगता है

बिल्कुल ढीठ बनकर
“अंकल दोनो लोग खायेंगे पैसे दो न”
और मैं उसकी मम्मी से
गोलगप्पे के पैसे लेता था
“आंटी वो आपके मोहल्ले का श्यामू
बहुत अच्छे गोलगप्पे बनाता है
,पैसे दो दोनो भाई खाएँगे”

या फ़िर दोनो का अब्दुल चाचा से
जोर से राम राम कहना
जिस पर उनका हँस कर कहना
राम राम जीते रहो दोनों

और रामू काका से दोनों का
रौबीली आवाज़ में सलाम करना
रामू काका वालेकुम सलाम कहते
और दोनों के गालों को सहला देते

पर अब कुछ दिनों से
अब्दुल चाचा हम दोनों के
सलाम का जवाब नहीं देते
ना ही रामू काका राम राम का जवाब देते हैं
कहते हैं

हमने जितनी मेहनत से सींचा था पेड़
उतनी तो छाया भी नहीं है
फल की उम्मीद क्या करें
हम बदलना चाहते हैं आसपास का माहौल
मंदिर मस्जिद का झगड़ा ख़त्म करना चाहते हैं

पर सब रोक रहे हैं कहते हैं
अब ये सब नेताओं के इशारे पर चलने लगा है
तुम दोनों इन चक्करों में न पड़ो
और हम सोच के रह जाते हैं

इबादत या पूजा किसलिए की जाती है
क्या इतना भी नहीं पता है किसी को??

 

 

-मुसाफ़िर तंजीम

 

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