Do Ajnabi | Mid Night Diary | Anupama Verma

दो अजनबी | अनुपमा वर्मा

वो दोनो अजनबी
एक दूसरे से प्यार करते थे
मेरे माँ बाबा एक दूसरे की
खुद से ज्यादा फिक्र करते थे

माँ बाबा के कहने से
पहले ही समझ जाती थी
आफिस बाबा जाते थे
पर फाईले उनकी, माँ को ही पता होती थी

बाबा की कमीज के बटन
माँ ही बंद करती थी
कितनी भी देर हो जाती
उनके बिना खाना नही खाती थी

बाबा के चेहरे की शिकन
पल भर मे भाप लेती थी
नोंक झोक चलती रहती थी
पर कभी बात बढने नही देती थी

माँ बाबा के पसंदीदा रंग
के ही कपडे पहना करती थी
बाबा को कहते सुना था एक दिन(सारी बाबा)
हल्के रंग मे बहुत प्यारी लगती है

कुछ ऐसे है मेरे बाबा की बाते
गर माँ हमारी वजह से थोडा भी परेशान हो
तो वो लगा देते थे हमारी क्लासे

संडे की अपनी छुट्टी बाबा
माँ को हर हफ्ते तोहफे मे देते थे
हमे साथ लेकर पहले सफाई करना
और फिर खाना बनाना सब काम करते थे

बाबा हमेशा कहते खाना मैने बनाया है
फिर मै नाराज होती तो कहते
हाँ! हाँ! माएशा ने भी मेहनत की है

और याद है मुझे वो मेले मे बाबा की फिक्रे
गोद मे मै होती थी
और दूसरे हाथ से माँ का हाथ थामे
सडक पर भी गाडी वाली तरफ
हमेशा बाबा चला करते थे

मुझे और माँ दोनो को ही
प्यार से जानेमन कहा करते थे

अरे! मै कुछ बताना भूल गई

खिडकी के पास बैठी
डायरी मे नजरे गडाएं
रूम नं 23 मे बैठी
ये माएशा लिख रही थी
माएशा!

एक 13 साल की लडकी
एक रोड एक्सीडेंट मे
खो चुकी थी अपना परिवार
हर दिन अनाथालय मे देखती है

लोगो की भीडे
एक दिन कहते भी सुन लिया
वो बता रहे थे उन्हे कैसा बच्चा चाहिए
यही सुनकर उसने
ये सब लिखकर माँ को दे दिया

(अनाथालय मे उनकी देखभाल करने वाली औरत जिन्हे वो सब बच्चे माँ कहते है)
और कहा
मुझे मेरे वही दो अजनबी, मेरे माँ बाबा चाहिए।

 

-Anupama Verma

 

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