Dikhawati Aansu | Mid Night Diary | Raushan Suman Mishra

दिखावटी आँसू | रौशन ‘सुमन’ मिश्रा

प्रश्न उठाना लाजमी है तेरी दोहरी नीति पर,
लाश बिछाया था तुमने बुद्ध अहिंसा धरती पर,
बूढ़े मासूमो को मारा जिहाद के जब नामोंं पर,

महिलाओं की आबरू लूटी क्या सच्चे इमानों पर,
तब कानों में रुई डालकर जानबूझकर सोये थे,
वर्मा पर तो चीख रहे हो काश्मीर पर चुप क्यों थे।

अफजल घाटी से आकर दिल्ली दहला जाते हो,
लोकतंत्र की छाती को जब घायल कर जाते हो,
क्यों बूढ़ी माओं की गोद सुनी कर जाते हो,

उन छोटे बच्चों के आंखों में आंसू दे जाते हो,
वो सारे आतंकी क्या तेरे फूफा जीजा लगते थें,
वर्मा पर तो चीख रहे हो काश्मीर पर चुप क्यों थें।

जिस धरती की रक्षा हेतु सैनिक प्राण गवांते हैं,
उस वीर बलिदान भूमि पर दम तुम्हारे घुटते हैं,
गीता के श्लोकों से मजहब खतरे में आ जाते हैं,

अतिथि देवो का मतलब हमको ही समझते हैं,
योग दिवस के नामो पर कीड़े काटने लगते थें,
वर्मा पर तो चीख रहे हो काश्मीर पर चुप क्यों थें।

उमर फैयाज अयूब पंडित घर मे मारे जाते हैं,
रोज मस्जिदों के बाहर तिरंगे जलाये जाते हैं,
देशद्रोही के बचाव में क्यों पत्थरबाजी होती है,

आतंकी के जनाजे में जब भीड़ दिखाई देती है,
सांप सूंघ गई थी क्या जब देशविरोधी नारे लगते थें,
वर्मा पर तो चीख रहे हो काश्मीर पर चुप क्यों थें।

 

-रौशन ‘सुमन’ मिश्रा

 

Raushan Suman Mishra
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