Dhundh | Mid Night Diary | Jay Verma

धुंध | जय वर्मा

लोगों को पसंद है धुंधलका,
जिससे न पहचाने जा सकें चेहरे।
छिपे रहें तथ्य,
अस्पष्ट रहें विचार,
और,
चलता रहे यूं ही,
ज्यों ही चलता है।

एक पलायान,
एक लुकाछिपी,
चलती है सतत,
इस स्पष्टता से।

धुंध, प्रभावी है,
सहायक है।
चोर को, मसीहा को,
नेता को, लेखक-कवि को ।
भ्रष्ट को, विचारक को,
मिश्रित चरित्र वाली, श्वेत-श्याम छवि को।

ये यथार्थ से भागना कहा जाए क्या?
या कहें सच के अनावरण का डर।
पर सारहीन भी है पूरा, जैसे
शत्रु से बचने को जमीं में सिर गड़ाता शुतुरमुर्ग।

 

-जयहिन्द वर्मा “जय”

 

Jay Verma
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