दीवारें | सुमित झा

मेरे कमरे की दीवारें मुझे जकरने लगी है।
और अंधेरा मुझे डराने लगा है।

बिस्तर की चादर मुझे बांधने लगी है।
यहाँ का सन्नाटा अब चीख़ने लगा है।

मेरी किताबें चिल्लाने लगी है।
सिगरेट ख़ुद राख बनने लगी है।

मेज पे पड़ी माचिस की तिल्लीयाँ जलने लगी है।
सूर्य की किरने अब यहां आने से कतराने लगी है।

दीवार पे टंगी एक फ़्रेम अब खाली है।
जिसमें तुम्हारे दिए हुए इश्वर का चित्र था।

मेरे धमनियां सिकुरने लगी है।
इनमें बहता रक्त अब जमने लगा है।

सांसे थमने लगी है।
इस देह का मांस जैसे घटने लगा है।

और इन सब के साथ मैं मरने लगा हूँ।
जब तुम यहां आओगी मुझसे मिलने।

तो तुम्हें मैं नहीं मिलूंगा इस कमरे में।
तुम्हें बस मेरी रोती हुई लाश मिलेगी।

उस वक़्त भी कुछ अधूरी सांसें बची होंगी मेरी।
जैसे उन्हे तुम्हारा इंतज़ार हो।

क्यूंकि मेरा आधा हिस्सा हो तुम।
आते के साथ मुझे पूरी मौत देना।

तुम्हारे प्यार में अधूरापन बर्दाश्त कर लिया।
अब आधी मौत नहीं झेल पाऊंगा।

 

-सुमित झा

 

Sumit Jha
Sumit Jha

841total visits,2visits today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: