Chintu | Gopal Yadav

आज डोरेमॉन नोबिता को कौन सा गैजेट देगा। सुनियो नजाने कौन सी डींग हाँकने वाला है। जियान किस किस को पीटेगा। सिजुका के सामने कैसे आज नोबिता बड़ी बड़ी बातें करेगा। भीम का पाला किस्से पड़ने वाला है। ऑगी कौन सा तरीका अपनायेगा कॉकरोचों से पीछा छुड़ाने को। घर जाते ही टीवी खोल के बैठ जाना है। और ऐसे ही नजाने कितने सवालों; कितने खयालों से “चिंटू” का मन भर गया जब आखिरी पीरियड की घण्टी बजी।

पाँच मिनट हो गए टीचर को क्लास में आये और चिंटू को अपने खयालों में गुम हुए। चूँकि आखिरी पीरियड आर्ट का होता है सो आने के कुछ देर बाद ही चिंटू की मैडम ने आवाज़ भारी करते हुए कहा, “सभी अपनी आर्ट की फ़ाइल निकालो,” अचानक कान में भारी आवाज़ जाने से चिंटू का वो खयाली रेत का मकान वहीं भरभरा कर गिर गया।

“आज हम लोग कार्टून बनायेंगे” चिंटू की मैडम ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा। “जी मैम”, सभी बच्चों का एक स्वर में जवाब था।

“मैम, हम लोग आज डोरेमॉन बनाये?” चिंटू की मैडम ने सहमति जताते हुए कहा, “हूं…ठीक है, चलो हम तुम लोग को डोरेमॉन बनाना सिखाते हैं।” डोरेमॉन बनाते हुए कब छुट्टी के वक़्त हो गया मालूम ही न हुआ।

छुट्टी होती है चिंटू मन ही मन मगन दौड़ते हुए बाहर स्कूल के गेट पर जा खड़ा हुआ। चिंटू की मम्मी आयीं। चिंटू से बैग लिया और घर की ओर रुख़्सत हो लिये।

अपने पूरे दिन का ब्यौरा देते हुए चिंटू उछलता कूदता एक हाथ से मम्मी का हाथ पकड़े तो दूसरे हाथ मे लॉलीपॉप लिए मस्ती में चले जा रहा था।

पानी की टंकी का जो चौराहा है, काफी भीड़ भाड़ वाला इलाका है। उस दिन ‘फलाने’ आंटी सज संवर के नजाने कहाँ जा रही थीं। चूँकि उस दिन भीड़ थोड़ी कम थी सो चौराहे पे ‘फलाने’ आंटी चिंटू की मम्मी की नजरें टकराने में समय न लगा।

“अरे! चिंटू की मम्मी, कहाँ गयी थीं…… और बेटा चिंटू कैसे हो?” वो अलग बात है कि वक साफ तौर पर चिंटू की मम्मी को एक हाथ मे चिंटू का बैग और दूसरा हाथ चिंटू, जो मजे से लॉलीपॉप खाये जा रहा था, के कंधे पर इसलिए रखी थीं कि कहीं गलती से चिंटू सड़क पर न चला जाये।

“बस, ‘फलाने’ भाभी जी चिंटू के स्कूल से आ रही हूँ, इसे लेने गई थी। चिंटू की तरफ देखते हुए चिंटू की मम्मी ने कहा। दोबारा ‘फलाने’ आंटी से मुख़ातिब होते हुए चिंटू की मम्मी, “….और आप कहाँ जा रही हैं; घर पर सब कैसे हैं?”

“हाँ, अरे….. वो स्टेशन के पास साड़ियों की नयी सेल लगी हुई है न, वहीं जा रही हूँ। कितने दिन हो गए शॉपिंग किये सोच थोड़ी खरीदारी करे आती हूँ। इतने दिन से ‘इनको’ कह रही थी, मगर सुने तब न। आज सोच अकेले ही चलती हूँ।”

“हाँ भाभीजी, मैंने भी सुना है कि वहाँ बेहतर दामों पर बेहतरीन साड़ियां मिलती हैं। मैं भी आज ही चिंटू के पापा से कहती हूँ कि मुझे भी शॉपिंग करा लायें।

अब चिंटू की लॉलीपॉप खत्म हो चुकी थी और वो उनके मुँह को देख रहा था। बीस मिनट बीत गए और उनमें से कोई अपनी बात खत्म करने को राजी नहीं था।

चिंटू को घर पहुंचना था और कार्टून का अगला एपिसोड देखना था। वो उसको किसी भी हाल में छोड़ नहीं सकता था। चिंटू के समझ मे नहीं आ रहा था कि क्या करे। अब तक वो दस दफ़ा बोल चुका होगा कि मम्मी चलो लेकिन चिंटू बस दो मिनट कह कह के उसकी मम्मी ने बीस मिनट गुज़ार दिये।

अब हर पल में चिंटू के चेहरे पर कई भाव नज़र आ रहे थे। कभी लगता मानो अभी चिल्ला पड़ेगा। कभी लगता तुरंत सब छोड़ ख़ुद अकेला घर चल देगा। तो कभी कुछ….

कभी टहलने लग जाता मानो मन को शांत कर रहा हो। कभी खुद में ही बकबक करने लग जाये। कभी खुदा से कहे कि आज थोड़ी देर से प्रोग्राम शुरू हो। कभी पैर पटक पटक कर मम्मी को चले का इशारा करता।

“चिंटू, क्या कर रहे हो! दो मिनट शांति से खड़े नहीं हो सकते हो।

चिंटू के हज़ारों लाखों भाव उस पर टूट पड़ने को अमादा थे।

“बाय डोरेमॉन!”- चिंटू मन में।

……और अब चिंटू रो रहा था।

 

-गोपाल यादव

 

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