बचपन की यादें | अमन सिंह | चाइल्डहुड मेमोरीज

बचपन की मीठी यादों की ठंडक आज भी सुकून के कुछ पल दे जाती है। आज कल गर्मी के दिनों में जब दोपहर के वक़्त कहीं से घंटी की आवाज आती है तो हम बिना कुछ सोचे, जाने, बस नंगे पाँव ही दौड़े जाते हैं। स्कूल के पास का वह नुक्कड़ जहाँ हर रोज़ भीड़ लगती है और सब इंतज़ार करते हैं कि हमारा नंबर कब आएगा और फिर खुद का नंबर आने पर ढेरों फरमाहिशें….

चुस्की, बर्फ का गोला, काला खट्टा या फिर आइस क्रीम जो भी कहिये, घंटी की आवाज सुनते ही हम दौड़े चले जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे मानों इन्द्रधनुष ने खुद अपने रंग हमारी हथेलियों में रख दियें हों। हम खुश होते हैं तो हमें देख कोई और भी मुस्कुरा उठता हैं। मान लो अगर कभी गलती है, हमारा बर्फ का गोल गिर जाये और हमारे पास पैसे न हो तो कभी कभी वह शख़्स हमे दूसरा गोल दे देता है। तब ऐसा लगता है जैसे सारे जहाँ की खुशियाँ हमारे पास आ गयीं हों।

जब धूप में खड़े हम, अपनी बारी का इन्तजार कर रहे होते है और हम धूप में नहीं रह पाते और यह कहते है थोड़ा जल्दी, तो हम यह भूल जाते हैं कि हर रोज़ कोई हमारे एक काले खट्टे के लिए घंटों धूप में खड़े होकर चासनी से भीगे रंग बिरंगे बर्फ के गोलों से मुस्कान बाँट रहा होता है। हर रोज़ बिना कोई बहाना बनाये वो मुस्कुराता चेहरा हमें वहीँ मिलता है। चलिए मिठास के कुछ रंग उसके लिए भी बचाये, आज फिर से एक चुस्की उस चुस्की वाले के नाम हो जाये…!!

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