Chandrma Kho Gya Kahin | Mid Night Diary | Swati Gothwal

चंद्रमा खो गया है कहीं | स्वाति गोटवाल

प्रात काल के वक़्त जिस गुलाबी चंद्रमा पर बैठकर तुम और मैं ढेरों बातें करते थे ,वो चंद्रमा खो गया है कहीं।
मेरी काली बिंदी के आकार जितना इस काले से संसार में,
वो गुलाबी चंद्रमा गुम गया है कहीं,
जाओ, ढूंढो, देखो, खोजबीन करो उसकी,पता लगाओ सबको उसका हुलिया बताओ |

गुलाबी चंद्रमा उतना ही गुलाबी था,जितना वो गुलाबी झुमका,
जो तुमने मुझको सफ़ेद बक्से में रख कर दिया था।
चंद्रमा पे एक वृक्ष पनपा था, जिसकी पत्तियां तुम्हारे नीले कुर्ते से मेल खाती है , उस वृक्ष के नीचे बैठ कर हम बरसातों से बचा करते थे ,उस वृक्ष की जड़े बरसात में चंद्रमा को कस कर जकड़ लिया करती है, वैसे ही जैसे तुम मुझे पकड़ा करते थे, वृक्ष की एक पत्ती पर तुम्हारी कलम रख कर आई थी मैं |
खो गया अब सब कहीं,
जाओ, ढूढो, देखो , मेरा गुलाबी चंद्रमा खो गया है कहीं |

एक नदी बहती है मेरे चंद्रमा से ,
जिसके किनारे की खिड़की से,एक सड़क दिखाई देती थी उस सड़क के फुटपाथ पर एक बूढ़ा लालटेन लिए झुमके बेचा करता है , मेरे झुमके उसी से खरीद कर लाते थे ना?
ठीक उसी खिड़की के नीचे, मैं सहारा लगा कर बैठा करती, और तुम गोद में बादल ओढ़े लेटा करते,और मुझे मेरी भूरे रंग वाली डायरी से कवितायेँ सुनाया करते थे,
तो वो बादल भी उस चंद्रमा के साथ खो गया है कहीं ,
जाओ, ढूंढो, देखो, मेरा गुलाबी चंद्रमा खो गया है कहीं |

और हाँ एक बेंच थी ,पीले रंग की |
उसका रंग तुम्हारे घर की पीली दीवारों से मेल खाता है, उस पर बैठ कर घंटो बातें किया करते थे हम ,वहां तुम्हारे कमरे की दीवार-घडी नहीं है बस |
खो गया अब सब कहीं वो बादल, खिड़की, डायरी,
वो वृक्ष, वो बातें सब कहीं |
तो जाओ, ढूंढो, देखो,
मेरा गुलाबी चंद्रमा खो गया है कहीं।

 

-स्वाति गोटवाल

 

Swati Gothwal
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