Bunkar Ka Khwaab | Mid Night Diary | Musafir Tanzeem | #UnlockTheEmotion

बुनकर का ख़्वाब | मुसाफिर तन्ज़ीम | #अनलॉकदइमोशन

इन सीलन भरी चार दीवारों के अन्दर
एक सपना सो रहा है।
वो सपना जिसमें ये दीवारें नहीं हैं
एक हरा भरा मैदान है।

जिसमें से एक नदी की
छोटी से धारा निकल रही है
जिसका पानी इतना साफ है
जैसे आईना हो। 

और उसके तल में दिखाई दे रहीं हैं
छोटी छोटी रंग बिरंगी मछलियाँ
जिन्हें मैं पास ही के बरगद के पेड़
की एक डाल पर बैठे बैठे
बहुत गौर से देख रहा हूँ।

हवा ऐसे चल रही है
जैसे मखमल गालों को सहला रहा हो
हौले हौले से
पास ही में एक झोपड़ी बनी है
जहाँ से मेरे परिवार वालों के
क़हक़हे गूंज रहे हैं

मेरे कानों में सब क़हक़हे मिसरी जैसे
घुल रहे हैं
रुक रुक कर सब मुझे अपने पास बुला रहे हैं
पर मैं उस डाल से उतारना नहीं चाहता
मैं सोने जाता हूँ। 

और आँखों को बहुत कसकर बन्द कर लेता हूँ
कुछ जाने पहचाने से हाथ मुझको डाल से उतारकर
कहीं लिटा देते हैं
सब मुझे जगाना चाहते हैं
पर मैं नींद में खोया रहता हूँ।

उनकी आवाज़ों को अनसुना करता रहता हूँ
सपना टूटने के डर से जागता नहीं है
पर भला कब तक
कुछ पानी की बूँदों से नींद
शीशे की तरह टूट जाती है।

और मैं ख़ुद को अपने बिस्तर पर पाता हूँ
सभी लोग मुझे घेरे हुए और परेशान से लगते हैं
कुछ दवाएं तुरंत मुझे दी जाती हैं
सुई की हल्की सी चुभन अब महसूस होती है। 

माँ माथे पर हाथ फेरती हैं
और पानी की पट्टी करती है
दोनों सपने एक साथ टूट जाते हैं।

एक याद नहीं रहता
एक भूल नहीं पाता

 

-मुसाफिर तन्ज़ीम

 

Musafir Tanzeem
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