ब्लू व्हेल | अर्चना मिश्रा

प्रीतम बैठा हुआ था। चेहरे पर वही पुरानी उदासी के भाव लेकर। उसे समझ नहीं आता था कि आखिर वह ऐसा क्या करे जिससे उसके अस्तित्व के सशक्त होने का प्रमाण लोगों को मिल सके। हाँ, वह प्रमाणित करना चाहता था। वह बताना चाहता था सबको कि वह भी योग्य है, हास्यास्पद नहीं जैसा सब समझते हैं उसे।

13 वर्ष के एक किशोर के मन में स्वयं को सिद्ध करने की यह प्रचंड भावना विचित्र प्रतीत हो सकती है, किंतु मानव जीवन का एक अमूर्त सत्य यह है कि मानव जन्म से ही अपनी ओर ध्यान आकृष्ट कराने को उद्यत रहता है। वह उसी ओर आकर्षित होता है जिस ओर उसे उसी प्रकार स्वीकार किया जाता है जैसा वह वास्तव में है।

“ऐसी हरकतें करनी है तो क्लास से बाहर निकलो।” शिक्षक-शिक्षिकाएँ आए-गये दिन उसकी शरारतों से परेशान रहते थे। एक तो पढ़ने में कमज़ोर, उस पर कभी भी होम वर्क ना करके लाने के कारण प्रीतम को टीचर्स द्वारा फटकार मिलना आम बात थी। दोस्त जब उसका मज़ाक बनाते और घर पर जब माँ-पापा उसे स्कूल से लगातार शिकायत मिलने के कारण डाँटते-पीटते तो प्रीतम एक ढीठ सी मुस्कान बिखेर देता।

माँ-बाप दुखी हो जाते और बाकी सब उसे पागल घोषित कर देते। किंतु धीरे-धीरे प्रीतम के मन को विचित्र भावों ने घेरना शुरू कर दिया। वह अपनी ओर इस प्रकार के व्यवहार से आक्रामक होने लगा। अब वह अक्सर इस बात से उदास भी रहने लगा कि कोई उसे किसी लायक नहीं समझते। मानव जीवन का सत्य! वह अब कोई साहस भरा भिन्न काम करने को लालायित हो उठा।

वह सबको दिखा देना चाहता था कि वह भी कुछ है। पर कैसे? जो उछल-कूद वाले काम वह जानता है, उससे तो लोग उसकी प्रशंसा नहीं, उसका परिहास ही करते हैं।

एक दिन अचानक उसे स्कूल के ही किसी लड़के ने इंटरनेट के द्वारा एक लिंक भेजा। यह शायद किसी ब्लू व्हेल नामक खेल का लिंक था। उस लड़के ने प्रीतम को इस खेल का लिंक इसीलिए भेजा था क्योंकि उसे इस खेल के कुछ कठिन पड़ाव को पार करने में मुश्किल हो रही थी, पर प्रीतम के लिए तो जैसे यह बाएँ हाथ का काम था।

वह उसे दिन-रात खेलने लगा। बड़ी ही तन्मयता से। माता-पिता दोनों कामकाजी होने के कारण ज़्यादातर समय बाहर रहते और दादा-दादी की बूढ़ी होती आँखें ठीक से कुछ देख नहीं पा रही थी। ऐसे भी प्रीतम काफी समय से अकेला-अकेला सा रहने लगा था, इसीलिए अब अगर वह दिनभर अकेले अपने कमरे में ही रहना पसंद करता है तो इसमें बहुत आश्चर्य वाली बात नहीं थी। खिड़की से उसके सामने किताब-काॅपी खुली हुई देख दादा-दादी निश्चिंत ही रहते, आधुनिक युग के धोखे से अनभिज्ञ।

वाह यार। तू तो सारे स्टेप्स आसानी से पार कर ले रहा। मुझे भी थोडे टिप्स दे दे ना। मुझे तो डर लगता है।जब एक दिन उसके दोस्त ने प्रीतम से यह बात कही तो वह गदगद हो उठा। बहुत दिनों बाद उसे ऐसा आभास हुआ कि वह भी खास है, कि वह भी कुछ ऐसा कर सकता है जो बाकी लोग नहीं कर सकते। उस दिन से उसे इस खेल से और भी लगाव हो गया। हर कठिन पड़ाव पार करने के बाद इस खेल की टीम से मोबाइल पर वाहवाही भरा संदेश प्राप्त करना उसके हौसले को और बढ़ा देता। दिन बीतते रहे और प्रीतम यह खेल खेलता रहा।

एक रात माँ अपनी व्यस्त दिनचर्या के बाद जब प्रीतम के कमरे में आईं तो उसके बाएँ हाथ में कुछ कटे-छटे से निशान देखकर व्यग्र हो उठीं। प्रीतम को नींद से जगाकर उन्होंने जाने क्या-क्या कहा। बेटे के सर को अपनी गोद में रख माँ सारी रात उसी तरह बैठी रही। मन-ही-मन जाने किस अपराध बोध से ग्रसित थी माँ। सोच रही थी, प्रीतम के बारे में।

जब प्रीतम का जन्म हुआ था तब उसके कोमल चेहरे को चूमकर अपने मन में एक संकल्प लिया था उन्होंने। क्या पूर्ण कर पायीं वे उसे? क्या समय की आँधी में चट्टानों से मजबूत संकल्प भी बड़ी आसानी से टूट जाते हैं? यदि नहीं तो कितने वर्ष पहले उन्होंने इस प्रकार प्रीतम का सर अपनी गोद में लिया था? प्रीतम को अब क्रिकेट से अधिक फुटबॉल देखना पसंद है, यह कब जानने का प्रयास किया उन्होंने? क्यों नहीं कभी पति से यह कह पायीं माँ कि प्रीतम अभी भी बच्चा ही है, उस पर अपने अरमानों का बोझ डालना सही नहीं? प्रीतम को लायक बनाने के चक्कर में उसका बेतरतीब बचपन कहाँ और कब गुम हो गया? देर शाम तक माँ आॅफिस के कामों में व्यस्त रहती हैं।

प्रीतम को सुरक्षित भविष्य देने के लिए ही ना? इस तरह देंगी वे अपने बेटे को एक सुरक्षित भविष्य? उसका वर्तमान खत्म कर? माँ और भी अधीर हो उठी। सोच रही थीं कि कब सुबह हो और कब वे एक नये दिन की शुरुआत कर सके। किंतु कल का दिन बेटे प्रीतम के लिए भी बेहद खास है, यह नहीं पता है उन्हें। कल बेटे के ब्लू व्हेल चैलेंज का 50 वां दिन है और अभी सपने में भी वह यही सोच रहा है कि इस आखिरी चैलेंज को पूरा कर मैं सबको दिखा दूँगा कि मैं भी बहुत कुछ कर सकता हूँ।

 

-अर्चना मिश्रा

 

Archana Mishra
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