भागी हुई लड़कियाँ | भावना त्रिपाठी

कैसा नकारात्मक शब्द है न भागना! जैसे कायरता को परिभाषित कर रहा हो। पीठ दिखा कर भाग जाना कोई बहादुरी का काम है भला? कितनी भी मुसीबत हो, मुश्किल हालातों का डटकर सामना करना चाहिए, ना कि घबरा कर भाग जाना चाहिए।यही सुनते आ रहे हैं न हमेशा से। वाकई, भाषणों में सुनने और किताबों में पढ़ने में अच्छी लगती है ये प्रेरणादायक पंक्तियाँ परंतु असल जिंदगी की वास्तविकता इससे परे है। बहुत सी लड़कियाँ मर जाती हैं अपने सपनों,अपने वजूद, अपने शौक के ख़ातिर पर फ़िर किसी अपने की ही बलि चढ़ जाती हैं।

बाल विवाह हो या बाल मजदूरी,देह व्यापार हो या अपनों द्वारा लगाई गई कीमत की खातिर बंद कमरे में समर्पण। विश्वास के साथ कह सकती हूंँ,भारत में होने वाले इन तमाम अत्याचारों को खुशी से स्वीकार नहीं करती होंगी। कितनी ही सीढ़ियाँ होती होंगी इन अत्याचारों के एक अंतिम चरण तक पहुँचने की। पहले तो अड़ जाती होंगी,लड़ती होंगी, झगड़ती होंगी, पीटी जाती होंगी, भूख-प्यास, शारीरिक, मानसिक न जाने कितनी ही प्रताड़नाओं को सहती होंगीं, फ़िर न जाने किस मजबूरी में हालात के साथ सौदा कर लेती होंगी। जो सौदा नहीं करतीं, वो और उनकी कहानियाँ जिंदा ही दफ़न कर दी जाती हैं। फिर उनका सपना, उनका वजूद, उनका शौक किस काम का.. जिसके लिए वो लड़ रही थीं? 

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। सकारात्मक और नकारात्मक।भागना भी सकारात्मक होता है, जिस सोच के साथ और जिसके बारे में मैं लिख रही हूँ।कान्हा भी तो भागे थे न और  रणछोड़ कहलाए थे ।”अहिंसा परमो धर्मः,धर्म हिंसा तथैव च”अहिंसा परम धर्म है किंतु धर्म के ख़ातिर हिंसा उचित है। झूठ बोलना पाप है, किंतु एक सच को बचाने की खातिर सब झूठ माफ़ होते हैं। ठीक उसी तरह परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए पर एक वक्त़ पर आकर खुद के लिए फैसला लेना भी जरूरी हो जाता है और वहाँ भागना कायरता नहीं होती बल्कि वहाँ आप आगे आने वाली समस्याओं एवं चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो रही होती हैं।

कैसी होती हैं ये भागी हुई लड़कियाँ?अजीब होती हैं या शायद थोड़ी पागल सी या फिर जुनूनी,हिम्मती और साहसी। कुछ भी हो पर होती बड़ी कमाल की हैं। हम आम लड़कियों से थोड़ा हटकर होती हैं। इनकी कोई प्रचलित परिभाषा नहीं है और ना ही इन्हें  चंद वाक्यों में समझाया जा सकता सकता है। ये बाकी लड़कियों की तरह नाजुक नहीं होतीं बल्कि इनमें हालातों से लड़ने की हिम्मत होती है। इन्हें ज़िद्दी,बिगड़ैल,बदचलन जैसे शब्दों की उपाधि दी जाती है। यह देखने में कुछ उखड़ी सी होती हैं, बेपरवाह सी ,जैसे कि कोई परवाह ही ना हो, ना कोई चिंता। इनकी आँखों में एक गहराई सी होती है। थोड़ा दर्द,पीछे सब कुछ भूल जाने का, थोड़ी चमक, आने वाले कल की और थोड़ी उदासीनता,भविष्य की अनिश्चितता की। ये मेरी और आपकी तरह लौकी,कद्दू,करेले में नुक़्स नहीं निकालतीं। वक्त से पहले समझदार,निर्भीक और आत्मनिर्भर हो जाती हैं।

इन भागी हुई लड़कियों से मिलने के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ेगा। आसानी से मिल जाएँगी ,कहीं प्लेटफार्म के किसी कोने में संदेह और सवालिया नजरों से लोगों को तकती हुई या चकाचौंध वाली दुनिया में नाम कमाने की चाह में माया नगरी जाती हुई ट्रेन में, देहरादून के किसी माउंटेनियरिंग ट्रेनिंग सेंटर में या सेल्फ डिफेंस और स्पोर्ट्स वाली उस अकेडमी में जहाँ ‘लड़कियों वाले काम’ नहीं होते।

क्या चलता होगा उनके मन में, कभी-कभी यह ख्याल बहुत कौंधता है मन में! क्या इनका मन नहीं करता होगा, उस किनारे वाली दुकान से लेकर झुमके पहनने का या बर्थडे में केक मुँह पर लगाने का? 

इन्हें भी याद आती है अपने माज़ी की,घर की,  रिश्तेदारों की, क्योंकि ये भी आम होती हैं पर हालात के अनुसार साहसी बनकर कुछ खास कदम उठा लेती हैं।

कितना साहस और हिम्मत का काम होता है घर से भाग जाना!! अपने पीछे तमाम तोहमतों को छोड़ जाना,जो पड़ोसियों, घर परिवार वालों और रिश्तेदारों द्वारा आपके चरित्र पर लगाई जाती हैं।

भटकने से बचने के लिए घर से निकलने के पहले गूगल मैप देखने वाले हम जैसे लोग कैसे समझेंगे, वह हालात ,जब उन्हें पता ही नहीं होता कि आगे जाना कहाँ है। यह लड़कियां कोई ट्रेंड नहीं होती घर से भागने में। हर महीने सामने आने वाली उस ‘लड़कियों वाली परेशानी’ से वाकिफ़ होती हैं, फिर भी भागती हैं। जून की गर्मी में,झुलसाने वाली धूप में किसी पीपल की छाया की उम्मीद से नहीं निकलतीं वो,ना ही दिसंबर में घर छोड़ते वक्त कंबल और रजाई लेकर चलती हैं ।उन्हें बस भागना होता है सारी नकारात्मकता और डर से। हाँ डर, यह लड़कियाँ
डरपोक होती हैं।बहुत डरपोक।, डरती हैं,खेलने-पढ़ने और सपने पूरे करने की उम्र में माँ कहलाने से। डरती हैं,अपने आपको ‘हरेक’ के सुपुर्द करने में,डरती हैं, रिश्तो के उन बंधनों से, जो उनके रास्ते आएँगे।वो पीछे छोड़ आती हैं उन कहानियों को ,जो उनके लिए अनुकूल नहीं थी।वह समाज के ठेकेदारों के आगे सर नहीं झुकातीं।

कितने नादान हैं हम और आप,जो चौराहे में शोहदों को फटकार कर कॉलर ऊँची करते हैं। सेक्स ,अंतर्वस्त्र और महावारी जैसे विषयों पर खुलेआम बात करके खुद को साहसी, निर्भीक ,आधुनिक और ‘बोल्ड’ महिला मानते हैं। असली हिम्मत, साहस और जुनून तो इनके पास है, जो इन्हें अपने वजूद के खातिर, समाज और घर वालों के खिलाफ कदम उठाने को प्रेरित करता है।

इतना साहस हम जैसी लड़कियों  में नहीं है। कम से कम मुझ में तो बिल्कुल भी नहीं ।वाकई बहुत अजीब होती है यह भागी हुई लड़कियाँ!

 

 

-भावना त्रिपाठी

 

Bhavna Tripathi
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