Beti Ke Naam Khat | Mid Night Diary | Hridesh Kumar Surtakar

बेटी के नाम ख़त | हृदेश कुमार सूत्रकार

प्रिय बेटा,

जब तुम करीब 1 साल की थी, तब मैंने तुम्हें पहली बार अपनी गोद मे उठाया था।
वो 1 साल का वक्त इसलिए लगा क्यों कि तुम बहुत नाजुक थी, और मेरे हाथ लोहे का हथौड़ा पीटते पीटते इस तरह हो गये थे कि कई बार अपने चेहरे को छूने से भी डर लगता था, और फिर तुम तो मेरी गुडिया थी।

मुझे सब कुछ ठीक ठीक से याद नही पर अगले महीने की 16 तारीख को तुम 26 साल की हो जाओगी।

बेटा मैंने तुम्हे बहुत मेहनत से पढाया, बहुत पैसे खर्च किये, दिन रात एक किया, अपना पेट काट काट कर तुम्हे इस लायक बनाया कि लोगों के बीच रहना सीख सको। हमेशा अब्बल आ सको , जीतो और आगे बढते रहो।

अब तुम सोच रही होंगी कि कुछ नया बोलो पापा ये सब तो आप हमेशा बोलते रहे, खुद रोयें और हमे रूलाते रहे।

ये पत्र मैंने तुम्हे यह सब बोलने के लिए नही लिखा, मैने तुम्हे ऐ खत तुमसे माफी मांगने लिखा है, हो सकता है कि कुछ देर हो गई हो पर ज्यादा देर नही हुईं।

तुम्हे बेहतर बनाने कि कोशिश मे दूसरो को हराना सिखाया मैंने, मेरे सपने तुम पूरा करो ऐसा पाठ पढाया मैंने, लोगों की भीड़ मे भेज तो दिया पर कभी ये नही बोला कि अपनी पहचान अलग बनाना पर किसी को खुद से अलग मत समझना, अच्छे कपड़े पहनना मगर किसी की फटी बनियान का मजाक मत उडाना।

अब तो ऐसे लगता हैं जैसे तुम्हे अच्छे स्कूल से अंग्रेजी सिखा कर किसी रेस मे शामिल कर दिया था, तुम शायद अब ठीक से सो नही पाती होगी क्योंकि तुम्हे अपनी मां की लोरी मे ही शुकून की नींद आती थी।

पर तेरी मां को तो अंग्रेजी नहीं आती थी उसे सिर्फ तुम्हे प्यार करना आता है। ये सब लिखने का मकसद ये नहीं है कि मै तुम्हे emotional blackmail कर रहा हूँ।

बस गुजारिश इतनी है कि जो गलती मैंने कि है वो तुम मत करना। मेरे पिताजी ने कभी कोई ऐसा खत् नहीं लिखा था, पर तुम्हे इसका इंतजार नही करना पडा।

और सुनो शुरू में लिखा बेटा हटाकर वहां बेटी कर देना, मै समाज की बजह से 26 साल मे नही कर पाया इसके लिए शर्मिंदा हूँ ।

और हां अब आ सकती हो तुम इस शनिवार को घर.. मैंने कल ही नई बनियान खरीदी है।

-तुम्हारा पापा

 

-हृदेश कुमार 

 

Hridesh Kumar
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