Bahroopiya Prem | Mid Night Diary | Veebha Parmar

बहरूपिया प्रेम | विभा परमार

प्रेम
बहरूपियापन से कम नहीं

प्रेम के अनेकों रूप
बेचैनी
छटपटाहट
आशा
निराशा
आकर्षण
मौन
खनकती हँसी

जो बयां कर देती है सबकुछ
तुम्हारा मेरे अंदर रोज़ बढ़ना और
मेरे अंदर मेरा ही कम हो जाना
सोचती हूँ
मैं इस युद्ध में अकेली तो नहीं ऐसे कितने दिल होंगे!

जो बिखरे, टूटे और फिर संभले होंगे
मगर इनकी घटनाएँ सदियों पीछा करती है
बहरूपिया बनकर!

ये जो सब घटित हो रहा है
वो ना दुर्भाग्यपूर्ण है और ना ही सौभाग्यपूर्ण ही है
इसमें ना तो तुम्हारा बस चलता और ना ही मेरा
जानते हो!

ये प्रेम जो है
वो महीन और रेशमी धागा है अगर एक बार उलझ जाए
तो इसका सुलझना मुश्किल रहता है!

कुछ तुम भी ऐसे ही हो
महीन और रेशमी धागा
मगर तुम निकले तेज़धार के
जो खुद को सुलझाकर चले गए
अपने स्वामित्व को पाने!

और मैं ठहर गई चट्टान सी
जो ना अब पिघलती है और ना ही
कोई प्रतिक्रिया करती है
बस अंदर ही अंदर चलता रहता है मज़र प्रेम और प्रार्थनाओं का!

 

-विभा परमार

 

 

Veebha Parmar
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One thought on “बहरूपिया प्रेम | विभा परमार

  1. “तुम्हारा मेरे अंदर रोज़ बढ़ना और मेरा ही मेरे अंदर काम हो जाना”
    बहुत खूबसूरत,

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