Baarish | Mid Night Diary | Anupama verma

बारिश | अनुपमा वर्मा

धरती पर आज फिर, बूंदो की चादर बिछी

मोहब्बत बेहिसाब है, कि नजर हटती ही नही

बूंदो की फुहार से, धरती को फिर राहत मिली

हमे मिली ना राहत, पर उम्मीद तो मिल ही गयी

घरो,पेडो की धूल धुली, सूरत ही बदल गयी

मौसम बदला है जनाब, हम कोई दल बदलू नही

निर्गुण होती मिट्टी को भी,फिर नयी सुगन्ध मिली

इस मौसम तू आया नही,पर तुझे याद तो आयी होगी

शहर डुबो दिए कभी, कभी जीवन दायिनी बनी

मोहब्बत है किसी के लिए, किसी के लिए आफत बनी

बारिश तो बारिश है जनाब, इसका कोई जाति धर्म नही

ना सीमाए तय कर तू इसकी, तेरे रोके ये रूकेगी नही

 

-अनुपमा वर्मा

 

 

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