Ashudh | Mid Night Diary | Aayush Paul

अशुद्ध | आयुष पॉल

सूरज की पहली किरण खिड़की के दरारों से होते हुए दस बाय बारह के कमरे में दुर्गेश की आँखों को सिकोड़ ही रही थी कि माँ की आवाज़ कानो तक पहुच गयी, पर माँ के स्वर आज कुछ बदले से थे।

आज स्कूल जाने में देर हो जायेगी की कर्कश आवाज़ कानो में पड़ने के बजाय उठ जा मेरी गुड़िया की आवाज़ कानो को मिली।आज दुर्गेश का जन्मदिन था। माँ का स्नेह भरा हाथ गुड़िया के बालो से होकर गालो तक पंहुचा और गुड़िया की आँखें धिमे से खुली और सामने माँ को देखा, शायद इससे अच्छी सुबह कुछ नही हो सकती थी।

दुर्गेश तैयार हो जा बेटी देवी माँ के मन्दिर चलना है, बोल कर माँ कमरे से निकल ही रही थी कि अचानक आँखे दुर्गेश के बिस्तर पे सफ़ेद चादर पर पड़ी और कदम थम गए। उस सफ़ेद चादर में आज कुछ लाल धब्बे थे।

माँ ने चुपचाप दुर्गेश से कहा नहा लो पर बाल मत धोना और भगवान को मत छुना, अचरज भरी निगाहो से तेरह साल की दुर्गेश ने पूछा क्यों माँ आज तो मेरा जन्मदिन है ना तो देवी माँ का आशीर्वाद तो ज़रूरी है?

तुम अभी अशुद्ध हो देवी माँ बुरा मन जायेंगी, दुर्गेश के समझ से सब परे था। आज के दिन की शुरुआत कुछ अलग थी, मन्दिर न जा पाने का दुःख तो था ही उसे, पर माँ की बात भी नही टाल सकती थी तो माँ से धीमे स्वर में पूछा माँ क्या मै दूर से हाथ जोड़ लूँ घर के मन्दिर में? माँ ने बिटिया का मन रखते हुए कहा जा जोड़ ले पर छुना नही, दुर्गेश ख़ुशी से मन्दिर की तरफ बड़ी तो पर उसके कदम अचानक रुक गए, मन्दिर में आज देवी जी नही थी…

आज दुर्गेश और दुर्गा दोनों अशुद्ध थे।

 

-आयुष पॉल

 

Aayush Paul
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