एन-अदर साइड | अमन सिंह

हिमालय के खूबसूरत ऊँचे ऊँचे दरख्तों से जब देखता हूँ तो जन्नत नज़र आती है। आस्मां को छु लेने वाली चोटियों से नीलम दरिया का पानी भी नीला ही नज़र आता है। लेकिन यह इस खुबसूरत सी सरजमी का आधा ही सच है। अगर यह जन्नत है तो यह नरक भी है। दूर से दिखने वाली यहाँ की खुबसूरत वादियां न जाने कितने मासूम लोगों के खून से रंगी है। न जाने कितनी ही चीखें, पुकारें इन पहाड़ियों में दफ़न हो गयी हैं। जब अपने आस पास देखता हूँ तो सारे ही मुझ जैसे ही नज़र आते हैं। चेहरे पर मुस्कान तो है पर कोई खुश नहीं।

सरहद के थोड़ी दूरी पर कुछ घर नज़र आते है। कभी कोई बच्चा दोस्तों के साथ मस्ती करता नज़र आता है, कभी कोई माँ अपने बेटे को प्यार करती हुई। कभी कोई आशिक़ अपनी महबूबा का इन्तजार करता हुआ नज़र आता है तो कभी कोई लड़की अपने गीले बालों को सुखाती नज़र आती है। उन्हें देख अक्सर खुद पर अफ़सोस होता है। चिठ्ठी, ख़त, टेलीग्राम, ट्रांजिस्टर और मोबाइल, सारे रिश्ते बस इन्ही में सिमट के रह गए हैं। अगर कभी घर वापसी का मन होता भी है तो जंग ऐलान के फरमान आ जाते हैं।

समझ नही आता मुझे कि क्यूँ लोग सरहद और मजहब के नाम पर लड़ते हैं। क्यों सिर्फ जात पात के नाम पर लोग एक दूसरे को काटने को तैयार हो जाते हैं। मेरी भी माँ है मुझे भी उसके हाँथ के खाने की याद आती है। मैं भी उसके आँचल से लिपट कर सोना चाहता हूँ लेकिन यह जंग, यह सरहद, यह मजहब की दीवारें कभी ऐसा मुमकिन नहीं होने देतीं।

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