Ajnabi | Mid Night Diary | Kumar Jitendra

अजनबी | कुमार जीतेन्द्र

बस देख तेरी आँखो में हम,
तुझको अपना पाए है,
मन मस्त गगन की गलियों में,
दो चार छंद ये गाए है।

पर तुम ना हम को जाने है,
ना तुमको हम जाने है,
तुम छोड़ हमें अपने घर को,
बिन जाने ही चल आए है।

ना तुम हम से मिल पाए है,
ना हम तुम से मिल पाए है,
ना हम तुम को जाने है,
ना तुम हम को जाने हो।

ना आँखे हमसे बोली है,
ना लफ़्ज़ हमें पुकारे है,
पर ना जाने क्यों मन ये कहता है,
तुम हमको दिल में पाले है।

हम तुम को दिल में पाले है,
नाम तुम्हारा क्या होगा,
ये वक़्त हमें बतलाएगा,
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में।

हम अपने तन को ढाके है,
हम अपने तन को ढाके है,
तुम जब से हम को छोड़ गये,
तब से हम ना जी पाते हैं।

ना मर पाए है,
ना कोई परवाह करे मेरी,
में कब से तनहा बैठा हूँ,
पर दिल के हर कोने में हमने ख़्वाब तुम्हारे पाले है।

पर ना तुम हम को जाने हो,
ना हम तुम को जाने है,
हम छोड़ ज़माना सपनो में,
तेरे रास्ते पर चल आए है।

तेरे घर की गलियों में हम,
अपना दुखड़ा गाए है,
पर ना तुम हम को जाने है,
ना तुम को हम जाने है।

तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में,
यूँ रात हमारी गुज़रे है,
हम छोड़ अपनी गलियाँ,
तेरे शहर को चल आए है।

तुम हमको तनहा छोड़ गए जव से,
ना हम जग पाते है ना हम सो पाए है,
हम ख़ाली ख़ाली बैठे अक्सर थोड़ा रोते है,
पर होकर तनहा अपने दिल से।

अक्सर यू बोले है,
ना तुम हमको जाने है,
ना हम तुमको जाने है!!

 

-कुमार जितेन्द्र

 

Kumar Jitendra
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