अजनबी | दीप्ति पाठक

अजनबियों की महफ़िल में,
फिर से अजनबीयों सा नज़र आ तो सही ।।

अधूरा ही सही वो इश्क़ फरमा तो सही।।
जीने दे वो लम्हें फिर से,
जो रह गए थे पिछले इश्क़ में।।
मेरी हथेलियों में वो हाथ रख,
मुझपर फिर से वो यकीन दिखा तो सही।।

अजनबियों की महफ़िल में फिर से,
अजनबियों सा नज़र आ तो सही ।
इल्ज़ाम कुछ लगा मुझपर,
कुछ गलतियां अपनी भी सुना तो सही।।

आंखों की नमी को बेपर्दा कर ,
नज़रों से नज़रें मिला तो सही।।
आदत सी हो चली है तेरी बेरुखी की,
ज़रा मोहब्बत से सर पर हाथ फिरा तो सही।।

अजनबियों की महफ़िल में फिर से ,
अजनबियों सा नज़र आ तो सही।।

वादा है ना रोकेंगे इस बार,
चले जाना फिर चाहे छुड़ा के हाथ
बस एक आखरी बार इज़हार-ए-मोहब्बत,

करके दिखा तो सही
फिर से एक बार मेरे इश्क़ ,
को गलत ठहरा तो सही।।

चाहे फिर से मुझे रूसवा कर जा,
पर मेरी गलती बता तो सही।।
अजनबीयों की महफ़िल में,
बस एक आखरी बार मेरा अपना सा,
नज़र आ तो सही।

 

-दीप्ति पाठक ‘अजनबी’

 

Deepti Pathak
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