Aazadi | Mid Night Diary | Vinay Kumar

आजादी | विनय कुमार

उसकी आजादी कैद है
सोच के तालो मे कही
शुरूआत भी करे तो क्यों करे
उस चाबी को हाथ में उठाये क्यों कोई

ये हमारा मान है या है
इसमें फर्क समझे क्यों कोई
उसकी नजर झुके तो क्यों झुके
ऐसा सोचने वाला है कोई

उसके परों को सीने की हिम्मत
क्यों नहीं रखता कोई
उसके पेशे मे खामियां ही
क्यों निकालता है हर कोई

उसे उस घर की दहलीज मे ही
क्यों बांधना चाहता है हर कोई
इस जहान की वजह ए मर्द तू नहीं

वो नारी है ये समझता नहीं कोई
है आग वो जला सकती है
दहक जाये तो बुझा नहीं सकता कोई

– विनय कुमार

Vinay Kumar
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