Aashna | Mid Night Diary | Reshtu Kumari

आशना | रेष्टु कुमारी

हमारा नाम नहीं है, है पर कोई याद है,

कोई था जो इस नाम से किसी को बुलाया करता था,
कोई था जो इस नाम पर बेवजह मुस्कुराया करता था,

लहजा याद है उसका, याद है वो हसीं,
वो आँखों में शरम, वो अंनदेखि गुदगुदी,

हर रोज उसकी गली में उसका आना जाना रहता था,
औऱ हमारे खिड़की के सामने उनका दरवाजा रहता था,

किसकी खिड़की और किसका दरवाजा,
हर रोज आशना की गली में उसका आना जाना रहता था,
औऱ हमारे खिड़की के सामने जनाब का दरवाजा रहता था,
मुन्तजिर हम भी अपनी खिड़की पे बैठा करते थें,
क्यूँ?

क्योंकि इनायत अल्लाह की वो हर रोज उसी दरवाजे से तो निकला करते थे,

शुरुआती दौर में मोहब्बत कुछ खास नहीं थी उन दोंनो के बीच,

हमें कैसे पता? एक खत था आशना के नाम,

है सच है वो खत हमारे हाथों से ही भिजवाया करते थें,

लिखा था उसमें
“तुम क्या चाहती हो आशना, मैं यू हीं तेरी गली से गुजरूं तेरा नाम पुकारते हुए,

तुम हिजाब उठा के भी न देखो गेसुएँ सवांरते हुए,
हमारा सच छुपाना चाहती हो क्या आशना!
तुम क्या चाहती हो आशना?”

पहला खत तो यही था बाकी हमने पढ़ी नहीं,
क्यों? हम चाहते थे कि दो दिल के बीच एक जान आड़े नहीं,

मेरा मन रोज कहता है बुरा लगता है जब तेरी मोहब्बत किसी और से मोहब्बत फरमाती है,
रजनीश सी रहती है खुदा से,
उसकी पक्क हवाओं में भी साजिश नज़र आती है,
मुझे तो ये समझ मे नहीं आता कि जुस्तुजू तू किसके पीछे चली जाती है,

आखिर इख्तियार तो आज भी उसी के पास है,
तो तू रोज शिकायत किससे कर आती है,

“आशना”
नाम नहीं है तेरा ना जनाब की लकीरें तेरी लकीरों से मिलने आती है,

तो ताबिर में तू रोज रोज क्यूँ उसका नाम चाहती है?

 

 

-रेस्तु कुमारी

 

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