आँधियाँ घर नहीं बनाती | आकाश शुक्ला | अस्तित्व

पिछली बार जब वो आयी तो ठान के आयी थी कि उजाड़ के रख देना है सब कुछ,एक ही झटके में !!

ये बात तुम क्यों नही मानना चाहते ?

कितनी बार समझाया तुम्हे लेकिन तुम हो कि टस से मस नही होते, अजब ज़िद पकड़ के बैठे हो !!

अच्छा चलो माना कि वो इक पल को आ भी जाए,
चलो मान ही लिया कि वो आ गयी, फिर??

फिर क्या करोगे?
तमाशा बन के
अपना ही तमाशा देखोगे, है न ?

तुमको न अवार्ड दिया जाना चाहिए, दुनिया के सबसे बड़े आशिक़ का !!

तुम क्यों भूल रहे हो कि तुम सिर्फ एक जड़ फंसाये जर्जर हो चले पीपल और फिर भला ज़मीं से सटे हुए पेड़ का इक आंधी से क्या प्रेम, लेकिन तुम तो तुम हो !
तुम कहाँ समझोगे

कि ‘आंधियाँ घर नही बसाती’…

‘अस्तित्व’

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