Aadhuri Kahani Muqammal Ishq Ki | Mid Night Diary | Musafir Tanzeem

अधूरी कहानी मुक़म्मल इश्क़ की | मुसाफिर तंज़ीम

आज फिर से
वो ख़्याल ज़िन्दा हो गया है

जो कभी बो दिया था तुमने दिल में
चुपके से मेरे बाल सहलाते हुए
उस पर मुलाकातों और बातों की
बौछार भी हो रही थी

धीरे धीरे वो बीज अपनी जड़ें
पैवस्त करता जा रहा था
तब किसी ने ये किस्सा जमाने को बता दिया

इश्क़ की वो बातें घरवाले भी जान गए
तुम्हारे घर मे भी हंगामा हुआ
मेरे घर में भी हंगामा हुआ

मेरे घरवालों ने मेरी शादी तुरंत तय कर दी
और अगले दिन तुम्हारे घरवालों ने तुम्हारी
शादी तय कर दी

दोनों के प्यार का यही अंजाम लग रहा था
मैं लड़ना चाहती थी
तो तुमसे मिलने गयी
पर तुम घर में नहीं थे

तुम जा चुके थे
बहुत दूर
कुछ कहा भी नहीं
कुछ सुना भी नहीं
बस चले गए

जैसे तुम्हारे लिए मैं कभी थी ही नहीं
एक बार बस एक बार कहकर
चले जाते की तुम लड़ नहीं सकते

लेकिन तुम तो इतने डरपोक निकले
की मुझसे भी वो ना कह पाए
बाद में पता चला
तुम तो कुछ ज्यादा ही हिम्मती निकले

अपना घर अपना शहर मेरा प्यार
अपने वजूद का एक एक हिस्सा
तुमने छोड़ दिया

उन सपनों की लाश
उसी शहर में दफन करके
तुम चले गए थे

घर मे बात भी तुम साल में
बस कभी कभी ही करते थे
तुम्हारी माँ मेरे पास भी आईं थी
तब मैंने तुमसे बात करनी चाही थी

अपने गुस्से को भुलाकर
पर शायद तुम ख़ुद को ही भूल चुके थे
अजनबियों जैसी बात मुझसे करके
तुमने माँ को भी डाँट दिया था

पता नहीं ऐसा क्या तुम्हारे अंदर था
जो तुम्हारे अंदर दीमक की तरह घुस गया था
और तुम्हें अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था
और शायद तुम ऐसे ही रहते

अगर तुम्हारे पिताजी को
दो दिल के दौरे नहीं पड़े होते
और तुम्हारी माँ ने तुम्हें अपनी कसम न दी होती
तुम जब आये तो मैं तुम्हें लेने आना नहीं चाहती थी

नहीं चाहती थी कि तुम उस नफरत दुख से घिर जाओ
लेकिन मैं आयी तुम्हें लेने के लिए
ट्रेन 1 घंटा लेट थी और मैं वहीं स्टेशन में बैठी रही
सोचती रही ऐसी क्या गलती थी

जो तुम इतनी बड़ी सजा दे रहे थे
सबको और ख़ुद को भी
ट्रेन रुकी और भीड़ में भी मैंने तुम्हें पहचान लिया

एक जानी पहचानी मुस्कान दोनो तरफ दिखाई दी
वो पाँच सालों का ग़ुबार
बस एक मुस्कान से हवा में मिल चुका था

कुछ सवाल थे जिनका जवाब दोनो को चाहिए था
और वो जवाब बस इतना था
कि हाँ नहीं थी हिम्मत मेरी लड़ने की
और मैं जी भी नहीं सकता था

उस शहर में जहाँ मैं अपने ही
प्यार को रोज टूटता देखूँ
रोज रोज की वो जंग भी मैं नहीं लड़ सकता था

इसलिए भाग गया इस दुनिया से
कि शायद अजनबियों में ही सुकून मिल जाये
मगर सुकून नसीब कहाँ था

बस दर्द था तन्हाई थी
और तुम्हारी यादें
हाँ मैं सबका गुनाहगार हूँ

सबसे ज़्यादा तुम्हारा
हो सके तो मुझे माफ़ कर देना
स्टेशन से घर कैसे पहुँचे

मुझे आज तक याद नहीं
इतना ही याद है कि
जितना ग़ुबार मेरे अंदर था

उससे ज्यादा तुम्हें पछतावा था अपने किये
माँ पापा तुमको देखते ही खुशी से रो पड़े
और तुम्हारी माँ ने तुमसे
तुरंत कहा कि बेटा गुस्सा हमसे था

बहू ने तेरा क्या बिगाड़ा था
उस पल में तुम टूट गए
घर की ठंडी फर्श पर तुम

ऐसे बैठ गए जैसे कोई बच्चा
माँ तो मुझे पहले ही बहू मान चुकी थीं
लेकिन उस बीज को

अभी थोड़ी नमी
और बौछारों की जरूरत है
अब तुम आ गए हो
तो ये सिलसिला भी शुरू हो जाएगा

 

 

-मुसाफ़िर तन्ज़ीम

 

Musafir Tanzeem
Musafir Tanzeem

763total visits,2visits today

One thought on “अधूरी कहानी मुक़म्मल इश्क़ की | मुसाफिर तंज़ीम

Leave a Reply