आ अब लौट चलें | सौरभ मौर्या

अभी अभी गांव से लौटा हूँ। बहुत दिनों के बाद गया था। गांव में बहुत कुछ बदल गया है। सड़के पक्की हो गई हैं, नालियां भी बन गई हैं, झोपड़ियों की जगह पक्के मकानों ने ले ली है । ऐसा लगता है मानो अच्छे दिन आ गए हों।

गांवों के विकास को देख कर मन खुश हो गया ।लेकिन एक बात जो ध्यान में आई की गांवों में पुरषों की संख्या बहुत काम दिखाई दे रही थी । ज्यादातर महिलाएं, बच्चे और बूढ़े ही थे । वजह यह की पुरुष और युवा बच्चे कमाने के लिए शहर गए है । यह मेरे लिए हैरानगी की बात थी की गांवों के विकाश के वावजूद लोग शहर पलायन कर रहे है । हो न हो अभी शायद अच्छे दिन आये नहीं है ।

जिस समय गांव पंहुचा करीब एक बज रहे होंगे । गांव में अजीब सन्नाटा तह । उस सन्नाटे को को मैं अपने जूतों की आवाज से चीरता चला जा रहा था । घरो के बहार लेते हुए लोग मुझे ऐसे देख रहे थे मनो उनकी आँखे पहचानने से इनकार कर रही हो । तभी एक आवाज आई – ‘मंगल बाऊ के लायक हो का बेटा’ । मैंने जवाब दिया – ‘हाँ काका’ और आगे बढ़ गया । आगे चार घर बाद वाला घर मेरा था।

ख़ुशी का ठिकाना तह की मैं घर पहुचने वाला हूँ । घर के आगे कोई नहीं दिखाई दे रहा था । मैं आँगन में पंहुचा तो दादी चारपाई पे सोई थीं आहाट से उन्होंने आँखे खोल दीं । मैंने उनके पैर छ्ये तो उन्होंने आशीर्वाद के साथ साथ प्रश्नों की झड़ी लगा दी ।

‘खुश रहा बेटा अउर बताओ हाल – चाल’ – दादी ने कहा ।

‘अच्छा है दादी अपना बताइये’ – मैंने उत्तर देते हुए कहा । ‘रजत नाही आइन?’ दादी ने भारी मन से कहा। ‘ नही वो तो लखनऊ में ही रुक गए ‘- मैंने उत्तर दिया ।

‘बड़ा दिन हो गए देखे नाही। बड़ी इच्छा थी की देखि ली । हाँ भाई !काहे आवें ? यहाँ चौबीश घंटे बिजली थोड़े ही न रहेला , यहाँ किससे मिले आइहैं …..’ कहते कहते दादी की आवाज भारी हो गई और आँखों भी नाम हो आयी थीं । मैं चुपचाप मूक खड़ा रहा ।

यह सिर्फ संजय के घर का दृश्य नहीं है बल्कि लगभग हर उस घर की कहानी है जिस घर में ऐसे दादा – दादी रहते हों और उनका लड़का शहर में नौकरी करता हो।

यह बड़ा भयावह दृश्य है । जो लोग शहर में नौकरी करते है जब उनके बेटे-बेटियां जब कभी गांव अपने दादा दादी के पास आते है तो उन्हें उनकी भाषा, गांव की मिट्टी , बिजली की कमी इत्यादि उनकी अशुविधा का कारन बन जाती है और अनायास ही मुह से निकलता है ‘I can’t tolerate’।

अब इन पागलों को कौन समझाए कि जिन चीजों को वो tolerate नहीं कर सकते उन्ही चीजो में रह कर , दिन रात एक कर उन दादा दादी ने अपना पेट काट कर अपने बेटे को इस काबिल बनाया है कि वो शहर में नौकरी कर सके।

एक और बात गांवों की जो हवा और मिट्टी उन्हें बर्दास्त नहीं होती वो सहारो की हवा और कंक्रीट से कही ज्यादा स्वच्छ हैं ।

खैर छोड़िये !! ऐसा नहीं है कि सिर्फ गांवों से गए लोगों ने गांवों को भुलाया है बल्कि गांवों की मिट्टी और फिजाओ ने भी अपनों से दूर गए लोगों को भुलाना शुरू कर दिया है । फिर भी उन तरसती आँखों की खातिर कुछ पल के लिए ही सही आ अब लौट चलें ।

 

-सौरभ मौर्य 

 

Saurabh Maurya
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