Month: January 2018

Poetry

कौन हूँ मैं | साराँश श्रीवास्तव

कोई पूछे तुमसे कौन हूँ मैं तो कह देना कोई ख़ास नही बस एक दोस्त है सीधा सादा सा जो रहता हर वक़्त मेरे साथ है और रहेगा हर वक़्त साथ मेरे मैं गलत रहूँContinue reading

Ek Kahani | Mid Night Diary | Shreya Levy
Poetry

एक कहानी | श्रेया लेवी

आओ सुनाऊँ तुम्हें एक कहानी, एक प्रथा थी बहुत पुरानी… तीन लफ़्ज़ थे कहने ज़ुबानी, फिर हो जाती थी, ख़त्म कहानी।   ना कोई राजा, ना कोई रानी क्या थी ये मनमानी? तलाक़-ए-बिद्दत से मामलाContinue reading

Uljhane | Mid Night Diary | Krishan Kumar Pandey
Poetry

उलझने | कृष्ण कुमार पांडेय

जिंदगी की उलझनों से कुछ वक़्त मिला तो सोचा जिंदगी की उलझनों में क्या खोया क्या पाया है कोशिश की मुस्कुराने की हर ख़ुशी हर गम में कभी रुलाया है खुशियों ने तो कभी ग़मोंContinue reading

Coffee | Mid Night Diary | Amita Gautam
Poetry

कॉफ़ी | अमिता गौतम

आंसू बहुत है मेरी आँखों में, तुम्हारे इंतज़ार की ही वजह है, शिक़वे भी बहुत है तुमसे मुझे, तुम मिलो तो सारे गिले दिखाऊ तुमको मै, पर अब हमारी मुलाकात मुझे वो अधिकार नहीं देगी,Continue reading

Paristhiti Aur Swabhav | Mid Night Diary | Abhishek Yadav
Poetry

परिस्थिति और स्वाभाव | अभिषेक यादव

क्यूँ शांत हो तुम, मजे की बात है हँसते क्यूँ नही, क्या छिपा है तुम्हारे भीतर बतलाते क्यूँ नहीं । क्या बतलाऊँ मैं… शायद हमने खुद में हँसना,गाना,रोना सीख लिया है, शायद इन्हें चेहरे परContinue reading

Waham | Mid Night Diary | Akanki Sharma | Writer Saahiba
Poetry

वहम | एकांकी शर्मा | राइटर साहिबा

मुझको अकसर आजकल ये वहम होता है शायद उसने मुझसे नाता तोड़ दिया है सालों सफ़र में वो साथ था मेरे पर अब शायद तन्हा छोड़ दिया है ये इलज़ाम था कि भरोसा तोड़ा हैContinue reading

Khamosh Lamhein | Mid Night Diary | Saransh Shrivastava
Poetry

खामोश लम्हें | साराँश श्रीवास्तव

पाकीज़गी से लबरेज़ वो वक़्त कितना खूबसूरत होगा ठिठुरती हुई ठण्ड में जब हम किसी दरिया किनारे ओस की बूंदों को आग से मिला देंगे और सुलगती हुई ठण्ड के साथ हम साथ में जिएContinue reading

Intzaar Aur Bebasi | Mid Night Diary | Shweta
Short Stories

इंतज़ार और बेबसी | श्वेता

ये कहानी आपको 10 साल के पीछे के दौर और एक छोटे शहर में ले जाएगी। एक ऐसा शहर जहां मां बाप लड़कियों को पढ़ाते जरूर थे लेकिन शायद ही किसी लड़की को इंग्लिश मीडियमContinue reading

Poetry

किसकी नज़र लग गयी | अरविन्द सक्सेना

जाने किसकी हमें नज़र लग गयी बद्दुआ किसकी आज असर कर गयी छोटी छोटी सी बात गहरी होती गयी होंठ सिलते गए आँखें रोती रहीं मांगते भी तो क्या जवाब मांगते खुद हमारी ही शायदContinue reading

Lakeerein | Mid Night Diary | Maninder Singh
Poetry

लकीरें | मनिंदर सिंह

कुछ लकीरें खींचते खींचते कागज़ पर एक तस्वीर उभर आई लगा कोई अपना है पहचान वाला बिछड़ा हुआ घमखवार कोई उसकी आँखों में अपना माज़ी दिख रहा था मुझे उसकी खुशबू गुज़रे वक़्त का एहसासContinue reading